कश्मीर: 'दिल पर पत्थर रखकर की दूसरी शादी'
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भारत-प्रशासित कश्मीर में दशकों से जारी तनाव के बीच हज़ारों ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति ग़ायब हो गए और उन्हें ये नहीं मालूम कि वे ज़िंदा है या नहीं। इन महिलाओं को ‘आधी-विधवा’ कहा जाता है।
आरोप है कि वादी में तनाव जिन दिनों चरम पर था, उन दिनों सुरक्षा बलों ने पूछताछ के लिए वादी के कई मर्दों को उठाया लेकिन आज तक उनका कोई अता-पता नहीं है। कश्मीर में ज़्यादातर ‘आधी-विधवाओं’ ने दोबारा शादी नहीं की, लेकिन तसलीमा जैसी कुछ महिलाएं हैं जिन्होंने मजबूरी में ये कदम उठाया।
तसलीमा की पूरी कहानी उनकी ज़ुबानी
साल 1988 की बात है. मैं 12 साल की थी और गली में खेल रही थी. मोहम्मद यूसुफ़ मेरे पास आया और उसने सीना ठोक कर कहा, ‘मेरा तुमसे निकाह होने वाला है.’ मैं रोने लगी और उसकी शिकायत करने के लिए सीधा घर की ओर दौड़ी। जब मैंने अब्बा को बताया कि यूसुफ़ ने मुझसे ऐसी बात की, तो अब्बा ने कहा, "ठीक ही तो कह रहा है वो। कल तुम्हारा और यूसुफ़ का निकाह है." निकाह का दिन बस यूं याद है कि मैं उस दिन बहुत रोई थी। मुझे तो शादी का जोड़ा भी ठीक से फ़िट नहीं हुआ था।
शरारतें करते करते जवां हो गए दोनों
शुरुआत के कुछ साल तो यूसुफ़ के साथ आंगन में खेलते-खेलते ही कट गए। वो बचपन से ही बहुत शरारती थे। मुझे राह चलते ये कह कर डराते थे कि पास के जंगल से भालू निकल कर आ जाएगा और मुझे खा जाएगा। जब मैं 22 साल की थी तब हमारी पहली बेटी पैदा हुई। यूसुफ़ उस पर जान छिड़कते थे, और फिर तीन साल के अंदर हमारे तीन बच्चे पैदा हुए।
यूसुफ़ एक बोझिया का काम करते थे। दिन में चाहे दस रुपए ही कमाते थे, पर घर आते ही सारी कमाई मेरे हाथ में थमा देते थे। जब मैं घर के काम में मशगूल होती, तो यूसुफ़ बच्चों की देख-रेख किया करते थे। वो उन्हें स्कूल के लिए तैयार करते थे और उन पर बिना इत्र लगाए उन्हें स्कूल नहीं जाने देते थे।
अचानक वो हमें छोड़ गए
ज़िंदगी बेहद खुशहाल थी पर 12 मार्च 2001 के दिन हमारी ज़िंदगी बदल गई। उस दिन तीसरी ईद थी और हम सब मेरी बहन के यहां दावत पर जाने के लिए तैयार हो रहे थे। यूसुफ़ ने मुझसे कहा कि मैं तीनों बच्चों को लेकर उनके घर चली जाऊं और वो थोड़ी देर में हमारे पीछे-पीछे आ जाएंगे।
लेकिन वो नहीं लौटे। मैं कई दिनों तक उनकी तलाश में जंगलों में भटकी, सभी रिश्तेदारों को फ़ोन किए लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला। रो-रो कर मेरी हालत बुरी थी, पर यूसुफ़ के आने की आस दिन-पर-दिन कम हो रही थी। यूसुफ़ तो मुझे और बच्चों को बेहद प्यार करते थे, फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि वो अचानक हमें छोड़ जाएं?
क्या है युसूफ की मौत का सच?
उनके ग़ायब होने के छह दिन बाद आर्मी ने हमारे घर पर रेड की और मुझे बताया कि मेरा पति यूसुफ़ वादी के दहशतगर्दों से मिला हुआ है। उन्होंने मुझे कहा कि क्योंकि यूसुफ़ उन पर हमला करने वाला था, इसलिए उन्होंने यूसुफ़ को मार दिया। लेकिन फिर उनकी लाश मुझे क्यों नहीं दी गई?
पास के गांव वाले कहते थे कि यूसुफ़ की लाश को वहीं दफ़ना दिया गया है, लेकिन मुझे उनकी कब्र तक नहीं दिखाई गई। मैं नहीं जानती कि किसकी बात सच है, पर मेरा मन ये कहता है कि यूसुफ़ ऐसा नहीं कर सकते थे। आठ साल तक मैंने उनका इंतज़ार किया। उनके बिना ज़िंदगी आसान नहीं थी। पड़ोस के घरों में काम कर मैंने अपना और अपने बच्चों का पेट पाला। अपने दिल पर पत्थर रख अपने छोटे बेटे को श्रीनगर के एक यतीमखाने में भेज दिया।
युसूफ ही था पहला प्यार
दोबारा शादी कर मुझे ऐसा लगता था कि मैंने यूसुफ़ को धोखा दिया है। शादी के कुछ दिनों बाद मैंने एक सपना देखा कि यूसुफ़ बाइक पर सवार मेरी ओर आ रहे हैं, लेकिन मैं उनसे नज़रें नहीं मिला पा रही हूं क्योंकि मैंने दूसरी शादी कर ली थी। लेकिन यूसुफ़ ने मुझसे सपने में कहा, "जबसे तुमने दूसरी शादी की है, मुझे थोड़ी तसल्ली हुई है।"
वो सपना देखने के बाद मेरे मन का बोझ थोड़ा हल्का हो गया है। ऐजाज़ भी एक बेहद अच्छे इंसान हैं, लेकिन यूसुफ़ मेरा पहला प्यार था...उन्हें भुलाना नामुमकिन है। दिल ही दिल में मुझे आज भी ये टीस रहती है कि काश मेरा और यूसुफ़ का साथ ज़िंदगी भर का होता।
(तसलीमा का कहना है कि वे कभी चुनावों में वोट नहीं डालती क्योंकि उन्हें सरकार पर कभी भरोसा नहीं था.)