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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   The journey of faith became a journey of death: Three pyres were lit in one village, corpses were taken out fr

श्रद्धा की यात्रा बन गई मौत का सफर: एक गांव में जलीं तीन चिताएं... एक गली से उठी कई अर्थियां, शोक में डूबा शहर

Sun, 17 Aug 2025 05:39 AM IST
निकिता गुप्ता अमर उजाला, नेटवर्क जम्मू
अमर उजाला, नेटवर्क जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Sun, 17 Aug 2025 05:39 AM IST
सार

किश्तवाड़ के चिशोती गांव में बादल फटने से मचैल यात्रा पर गए श्रद्धालुओं पर कहर टूट पड़ा, जिसमें कई परिवार तबाह हो गए और कई लोग अब भी लापता हैं। जहां एक ही गली से चार अर्थियां उठीं और मासूम बच्चे अपनी मां को खोजते रह गए।
 

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The journey of faith became a journey of death: Three pyres were lit in one village, corpses were taken out fr
किश्तवाड़ आपदा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

किश्तवाड़ जिले के चिशोती गांव में बादल फटने से आया विनाशकारी सैलाब मचैल यात्रा पर गए सैकड़ों श्रद्धालुओं पर कहर बनकर टूटा। इस प्राकृतिक आपदा ने जम्मू शहर और आसपास के इलाकों में कोहराम मचा दिया। कहीं एक ही गली से चार अर्थियां उठीं, तो कहीं एक ही गांव में तीन-तीन चिताएं जलीं। कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनके लापता सदस्य अब भी शिनाख्त केंद्रों और अस्पतालों में तलाशे जा रहे हैं। मातम इतना गहरा है कि मोहल्लों की चहल-पहल भी थम गई है। 

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तीन साल का शौर्य मां को ढूंढ रहा है... 
राजिंदर कुमार की आंखों में अब सिर्फ एक ही तस्वीर तैर रही है - अपनी पत्नी हेमलता को आखिरी बार लंगर में मुस्कुराते हुए देखते हुए। तीन साल का मासूम बेटा शौर्य अब हर किसी से पूछता है- पापा, मम्मी कहां हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं। 

वीरवार को किश्तवाड़ के चशोती गांव में आए भीषण बादल फटने की घटना में बिक्रम चौक निवासी 32 वर्षीय हेमलता की जान चली गई। वह अपने पति और बेटे के साथ मचैल माता के दर्शन के लिए गई थीं। यात्रा के चौथे दिन, चशोती में एक लंगर में भोजन कर रहे थे। बेटा शौर्य बाहर जाने की जिद करने लगा। मां ने मना किया, लेकिन पिता उसे लेकर लंगर से कुछ दूर चले गए। 

राजिंदर ने बताया कि अचानक ते गर्जना हुई, मैंने पलटकर देखा तो पहाड़ से मलबे और पानी का भयानक सैलाब आ रहा था। लोगों की चीखें, भगदड़, और फिर लंगर के नीचे बह जाने की आवाजें। राजिंदर ने बेटे को सीने से चिपकाया और दौड़कर एक तरफ छलांग लगाई। किसी तरह अपनी और बेटे की जान बचाई, लेकिन जब पीछे देखा, हेमलता कहीं नहीं थीं। 

आसपास के लोगों की मदद से वह पत्नी की तलाश में जुटे। अट्ठोली अस्पताल में एक महिला का शव मिला। जाकर देखा, वही थीं हेमलता। 

शुक्रवार शाम शव जम्मू पहुंचा। मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया। हर चेहरा नम था। शनिवार सुबह अंतिम संस्कार हुआ। रिश्तेदार तिलक राज ने बताया कि हेमलता हमारी बहू नहीं, बहन थी। इतनी खुशमिजाज और मिलनसार, एक पल में सब कुछ खत्म हो गया। अब सिर्फ शौर्य की मासूम आंखों में मां के लौट आने का जोकि उम्रभर चलेगा। 

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मां-बेटे का एक साथ आता था जन्मदिन, अब एक साथ जिंदगी भी चली गई
बिक्रम चौक की गलियां गुरुवार रात से ही चुप हैं। वहां न बच्चों की चहचहाहट सुनाई दे रही, न कई घर में चूल्हा जला। मोनिका मेहरा और उनके बेटे नमन की मौत की खबर जैसे ही पहुंची, मोहल्ले में चीख-पुकार मच गई।

मोनिका वेयरहाउस के सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। बेहद समझदार और संस्कारी महिला के रूप में पहचानी जाती थीं। उनके पति निजी नौकरी करते हैं। मचैल यात्रा पर वह बेटे दस साल के बेटे नमन और 14 साल की बेटी गहना के साथ गई थीं। वीरवार को तीनों लंगर में खाना खा रहे थे, तभी बादल फटा और पहाड़ से सैलाब उमड़ पड़ा। लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही लंगर तबाही में तब्दील हो गया।

मोनिका और नमन की मौके पर ही मौत हो गई। गहना गंभीर रूप से घायल हुई और फिलहाल जीएमसी, जम्मू में भर्ती है। डॉक्टरों के मुताबिक उसके सिर और हाथ में गंभीर चोटें हैं।

मोनिका के भाई सन्नी बताते हैं कि 13 नवम्बर को मां और बेटे का जन्मदिन एक ही दिन आता था। हर साल घर में बड़ा उत्सव होता था। शुक्रवार को शव जम्मू पहुंचे। मोहल्ले के लोग फूलों के साथ अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। स्कूल के विद्यार्थी भी रोते हुए उनके घर पहुंचे।

शुक्रवार शाम दोनों का अंतिम संस्कार हुआ। बेटी गहना को अस्पताल में बताया भी नहीं गया कि उसकी मां और भाई अब इस दुनिया में नहीं हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उसका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है।

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घर का सूरज ढला… मां-बेटी लापता, बेटे को मिला पिता का शव
मढ विधानसभा के फ्लोरा गांव का हर घर इस समय गम में डूबा है। 52 वर्षीय शामलाल की मौत,और उनकी पत्नी व बेटी की लापता होने की खबर ने गांव को जैसे उजाड़ दिया है।

शामलाल, जो आटा चक्की और घोड़ा रेहड़ी चलाकर घर चलाते थे, सोमवार को मचैल यात्रा पर निकले थे। साथ में पत्नी सुषमा देवी और बेटी ईशा भी थीं। वीरवार को जब चिशोती से लौट रहे थे, तभी बादल फटने की भयावह घटना हो गई। उनके साथ चल रहे रिश्तेदारों ने बताया कि शामलाल और उनका परिवार कुछ पीछे रह गया था। एक तेज आवाज के साथ सैलाब आया और वे उसमें समा गए।

शामलाल का शव मलबे से बरामद हुआ। बेटे आयुष ने जब पिता का शव देखा, तो फूट-फूटकर रो पड़ा। रोते हुए कहा कि पापा के साथ तो मैं आखिरी बार झगड़ा कर बैठा था… अब कैसे माफी मांगू? ईशा एमएससी कर चुकी थीं, उसकी शादी के लिए रिश्ते देखे जा रहे थे।

सुषमा देवी पूजा-पाठ में विश्वास रखने वाली महिला थीं। शुक्रवार को शामलाल का शव घर लाया गया। रात भर रिश्तेदार जुटते रहे। शनिवार सुबह बेटे आयुष ने मुखाग्नि दी। गांव के बुजुर्ग हरबंस लाल कहते हैं कि कौन सोच सकता था कि माता के दर्शन के लिए निकला परिवार अब सिर्फ तस्वीरों में रहेगा। अब आयुष की आंखें बस मां और बहन को खोज रही हैं। हर गाड़ी की आवाज पर बाहर भागता है, शायद कोई खबर आई हो।

हर आंख नम थी... जब एक साथ उठीं चार अर्थियां 
शनिवार का सूरज जैसे ही जवाहर नगर की गलियों में चढ़ा, गली नंबर 10 मातम की चादर में लिपटी नजर आई। हर घर के दरवाजे पर खामोशी थी, हर आंख में नमी और हर दिल में टीस। यह कोई आम दिन नहीं था, चार जनाजे एक साथ इस गली से उठे। 

लोग सड़कों पर खड़े थे, चुपचाप, निशब्द। हर कोई जानता था, इन जनाजों के साथ सिर्फ चार लोग नहीं, बल्कि एक पूरा परिवार और कई रिश्ते भी रुख्सत हो रहे हैं। मचैल माता की यात्रा से लौटते समय बादल फटने की घटना में जान गंवाने वाले 60 वर्षीय नरेश कुमार, उनकी पत्नी 55 वर्षीय अनीता शर्मा, 28 वर्षीय बेटी शिवाली और पड़ोसन सोनिया गुप्ता की अंत्येष्टि पुरमंडल श्मशान घाट में हुई। जब चारों अर्थियां एक साथ उठीं तो पूरा मोहल्ला फूट-फूटकर रो पड़ा। 

24 वर्षीय कर्ण शर्मा, जो माता मचैल की यात्रा में अपने परिवार के साथ गया था, अब पूरी तरह अकेला रह गया है। हादसे के समय वह आगे निकल चुका था, तभी कुदरत ने उसकी पूरी दुनिया ही छीन ली। जब वह पीछे लौटा, तब तक सब खत्म हो चुका था। शवों के आने के बाद कर्ण की हालत ऐसी थी कि वह कभी चुपचाप जमीन को ताकता, कभी मां के कपड़ों से लिपटकर रो पड़ता। 

मोहल्ला निवासी राकेश सेठी ने कहा कि कर्ण अकेला नहीं है। पूरा मोहल्ला अब उसका परिवार है। उसकी देखभाल हमारी जिम्मेदारी है। उसे कभी ये महसूस नहीं होने देंगे कि वह अकेला रह गया है। स्थानीय लोगों ने सरकार से मांग की है कि कर्ण को राहत के साथ-साथ स्थायी रोजगार दिया जाए। वह जवान है, होनहार है। अगर उसे सरकारी नौकरी मिल जाए तो वह न केवल अपना जीवन संवार सकेगा बल्कि अपने माता-पिता का सपना भी पूरा कर पाएगा। 

शनिवार को जब चार चिताएं एक साथ जलीं, तो धुएं के साथ हर आंख से आंसू भी झुलसते रहे। मचैल यात्रा, जो श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है, इस बार एक मोहल्ले के लिए अपूर्णनीय क्षति बन गई।

बैनागढ़ से मचैल यात्रा पर गए सात लोग अब भी लापता
बैनागढ़ गांव अब सिर्फ एक नाम नहीं, एक प्रतीक बन गया है, इंतजार का, उम्मीद का और टूटते हुए भरोसे का। मचैल यात्रा पर गए गांव के 16 लोगों में से आठ अब भी लापता हैं।

गांव के बुजुर्ग मंगलदास की पत्नी 76 वर्षीय जीतो देवी, जिम्मी, पीहू, गोकल, अर्शल, अनन्या, राही इन नामों को गांव के हर घर में दिनभर दोहराया जा रहा है। वीरवार को बादल फटने की खबर के बाद से गांव में मातम है। शनिवार सुबह राहत की एक हल्की किरण आई ममता देवी का शव किश्तवाड़ अस्पताल में मिला।

उनके भाई ने शिनाख्त की। ममता देवी सेना से रिटायर्ड हूसनदास की पत्नी थीं। जब उन्हें खबर दी गई, तो वह कुछ देर तक बोल ही नहीं पाए। बस इतना कहा , जो अपने हाथों से खाना खिलाती थी, वो अब सफेद कपड़े में लिपटी मिली। गांव की महिलाओं ने शनिवार दोपहर हवन और पूजा शुरू की। कई लोग घर-घर जाकर दीया जला रहे हैं कि कोई चमत्कार हो जाए और बाकी लोग वापस आ जाएं।

प्रशासन की ओर से लापता लोगों की कोई स्पष्ट सूची नहीं आई है। इससे परिजनों की बेचैनी और बढ़ रही है। परिवार वालों ने शव को जीएमसी में रख दिया है और जब तक बाकी लोगों का पता नहीं चल जाता, ममता का अंतिम संस्कार न करने की बात कही है।

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