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न्यायालय का फैसला: मासूम के लिए कोर्ट ने बनाया 'प्यार का टाइम-टेबल', बच्चे को मिलेगा मां और पिता दोनों का साथ

Mon, 08 Jun 2026 10:49 AM IST
Nikita Gupta प्रवेश कुमारी अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
प्रवेश कुमारी अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Mon, 08 Jun 2026 10:49 AM IST
सार

जम्मू फैमिली कोर्ट ने एक मासूम बच्चे के हित में अंतरिम व्यवस्था करते हुए तय किया कि वह सप्ताह में तीन दिन दोपहर 1:30 बजे से शाम 7 बजे तक अपनी मां के साथ रहेगा।

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The innocent child will stay with the mother three days a week.
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : adobestock

विस्तार

कानून की किताबें बेशक रूखी-सी लगती हों लेकिन कभी-कभी अदालतों से ममता और पितृत्व के तालमेल की ऐसी अनूठी कहानी निकलती है जो दिल को छू जाती है। जम्मू-कश्मीर में सोमवार से अदालतें छुट्टियों के चलते बंद हो रही हैं किंतु इसके ठीक पहले जम्मू के फैमिली कोर्ट ने एक मासूम के लिए मां-पिता के प्यार का बंटवारा खाता खोल दिया है। फैमिली कोर्ट ने आपसी कड़वाहट को किनारे रखते हुए माता-पिता की सहमति से अगले दो महीनों के लिए ऐसा टाइम-टेबल तय किया है जिससे मासूम पिता के साये में रहेगा ही, वह मां के आंचल में भी खेल सकेगा। जम्मू के तालाब तिल्लो निवासी शिवानी कोतवाल ने बच्चे की अंतरिम कस्टडी के लिए आवेदन किया था। गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 7, 8 और 25 के तहत यह मामला गत 16 अप्रैल से लंबित है।

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गर्मियों की छुट्टियों के चलते कोर्ट आठ से 22 जून तक बंद है। ये मामला फैमिली कोर्ट में एडिशनल प्रिंसिपल जज अमित शर्मा के पास है। उन्होंने सुनवाई के दाैरान अंतरिम व्यवस्था के तहत मासूम के मां-बाप से मिलने के घंटे तय कर दिए। दोनों ने इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं। फैमिली कोर्ट की दी गई व्यवस्था के अनुसार पिता मानिक गुप्ता बच्चे को सप्ताह में तीन बार शुक्रवार, शनिवार और रविवार को दोपहर डेढ़ बजे उसकी मां के पास छोड़ेगा। याचिकाकर्ता यानी बच्चे की मां शिवानी बच्चे को उसी दिन शाम सात बजे तक या उससे पहले प्रतिवादी (बच्चे के पिता) के घर वापस छोड़ेगी। एडिशनल प्रिंसिपल जज ने अंतरिम आवेदन को मुख्य याचिका के साथ आगे की कार्रवाई के लिए 27 जून को पेश किए जाने के निर्देश दिए हैं।

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मां से दूरी न पिता से जुदाई, मिलने के लिए भेजना ही होगा
फैमिली कोर्ट ने साफ किया कि यह समझौता केवल अंतरिम उपाय के तौर पर किया गया है। मामले में अंतिम फैसला पारित होने के बाद इस व्यवस्था को वैध नहीं माना जाएगा। अदालत ने यह भी तय किया कि अगर निर्धारित दिनों में से किसी दिन प्रतिवादी उपलब्ध न हो तो वह बच्चे को किसी अन्य दिन मां के पास छोड़ेगा लेकिन सप्ताह में तीन दिन मां के पास भेजना ही होगा।

गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट-1890 की धारा 7, 8 और 25 का प्रावधान
इस अधिनियम की धारा 7 अदालत को नाबालिग के कल्याण के लिए अभिभावक नियुक्त करने की शक्ति देती है। इसकी धारा 8 स्पष्ट करती है कि अभिभावकत्व के लिए अदालत में याचिका कौन दायर कर सकता है अधिनियम की धारा 25 बच्चे की अभिभावक की संरक्षा में लौटने से जुड़ी है। अगर कोई बच्चा अपने कानूनी अभिभावक से दूर चला जाता है तो अभिभावक उसकी वापसी के लिए अदालत में याचिका दायर कर सकता है। यदि अदालत को लगता है कि बच्चे का अपने अभिभावक के पास लौटना उसके हित में है तो वह बच्चे की वापसी का आदेश दे सकती है। बच्चे को वापस लाने के लिए वारंट जारी कर सकती है। जरूरत पड़ने पर गिरफ्तारी का आदेश भी दे सकती है।

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