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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   STRATEGIES ARE BEING MADE TO REPROVOKE THE VOILENCE IN KASHMIR

घाटी में रची जा रही है हिंसा की आग को दोबारा भड़काने की साजिश

Sat, 15 Oct 2016 02:45 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू Updated Sat, 15 Oct 2016 02:45 PM IST
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STRATEGIES ARE BEING MADE TO REPROVOKE THE VOILENCE IN KASHMIR
kashmir - फोटो : PTI
घाटी में ठंडी पड़ रही हिंसा को भड़काने की दोबारा से साजिश रची जा रही है। इसके तहत लोगों में दहशत पैदा करने की कोशिश की जा रही है। दुकानदारों पर हमले, नागरिकों के वाहनों पर पथराव, आटो रिक्शा में आगजनी के साथ-साथ राजनीतिक नेताओं को धमकी और हत्याएं भी शुरू हो गई हैं।
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पिछले कुछ दिनों से घाटी में तेजी से सुधर रहे हालात से बौखलाए उपद्रवियों ने अब नया पैंतरा आजमाना शुरू कर दिया है। सुरक्षा एजेंसियों के पास इस बात के इनपुट हैं कि अब युवाओं को बोर्ड परीक्षा नवंबर में न कराए जाने के नाम पर भड़काया जा रहा है। परीक्षा स्थगित करने के लिए लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं।
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लोगों ने अलगाववादियों के बंद को किया नजरअंदाज

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घाटी में रौनक - फोटो : Amar Ujala
लगातार बंद से आजिज घाटी के लोगों ने अलगाववादियों के बंद को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। इसके तहत श्रीनगर शहर सहित कई इलाकों में सार्वजनिक वाहन सड़कों पर चलने शुरू हो गए। रेहड़ी पटरी वालों ने कारोबार शुरू कर दिया। टीआरसी के पास तीन महीने बाद लगी संडे मार्केट में खरीदारों की भारी भीड़ जुटी।

इससे बौखलाए उपद्रवियों ने कई नेताओं के काफिले पर पथराव किया। शिक्षा मंत्री नईम अख्तर को आतंकियों की ओर से धमकी के बाद सुरक्षा बढ़ा दी गई। इन सबके बीच हंदवाड़ा में रियासत के मंत्री सज्जाद गनी लोन के करीबी पीपुल्स कांफ्रेंस कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 
 

राजनीतिक कार्यकर्ता हमेशा से रहे हैं सॉफ्ट टारगेट

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kashmir - फोटो : PTI

घाटी का माहौल खराब करने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता हमेशा से सॉफ्ट टारगेट रहे हैं। आतंकवाद शुरू होने से लेकर अब तक सैकड़ों राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं। चुनावी सीजन में इस तरह की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। लेकिन घाटी के वर्तमान हालात में राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला फिर शुरू हो गया है।

साउथ एशिया टेररिजम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार घाटी में आतंकवाद शुरू होने से लेकर वर्ष 2010 तक रियासत में 587 राजनीतिक हत्याएं हो चुकी हैं। इसके बाद की घटनाएं जोड़ ली जाएं तो राजनीतिक हत्याओं का आंकड़ा लगभग 600 पहुंच चुका है।

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