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Jammu News: घाटी में तापमान में गिरावट से अस्पतालों में सीओपीडी और अस्थमा के मामले बढ़े
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- डॉक्टरों ने कहा, बढ़ता वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय कारक मुख्य कारण
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर में जैसे-जैसे तापमान में गिरावट आ रही है, घाटी के अस्पतालों में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और अस्थमा के मरीजों के भर्ती होने की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
डॉक्टरों ने कहा कि सर्दियों के दौरान ज्यादातर इमरजेंसी और कैजुअल्टी के मामले सीओपीडी से जुड़े होते हैं। यह फेफड़ों की एक ऐसी बीमारी है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता और जो बढ़ती रहती है। ये ज्यादातर धूम्रपान और बिगड़ते वायु प्रदूषण की वजह से होती है। उन्होंने इस क्षेत्र में रोकथाम, जल्दी डायग्नोसिस और बेहतर रेस्पिरेटरी केयर सुविधाओं की मांग की।
छाती की बीमारियों के एक्सपर्ट डॉ. नवीद ने बताया कि घाटी में सीओपीडी के मामले खतरनाक दर से बढ़ रहे हैं। धूम्रपान छोड़ना इस जिंदगी भर चलने वाली बीमारी को रोकने का सबसे असरदार कदम है। काफी संख्या में ऐसे लोग जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, उन्हें भी खराब एयर क्वालिटी के संपर्क में आने से सीओपीडी हो जाता है। कश्मीर में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। जलने से होने वाले एमिशन, इंडस्ट्रियल एक्टिविटी, घरों में लकड़ी और केरोसिन जलाने, बायोमास फ्यूल और यहां तक कि कांगड़ी में इस्तेमाल होने वाले चारकोल के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है।
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डॉ. नवीद के अनुसार धूम्रपान दर कम करने और ओवरऑल एयर क्वालिटी में सुधार करने से सांस की बीमारियों के मामलों में काफी कमी आएगी। उन्होंने प्रशासन से ठोस कदम उठाने की अपील की। उन्होंने लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी जैसे धूम्रपान छोड़ना, एलर्जी और सांस की तकलीफ वाली चीजों से बचना, पानी का अच्छा सेवन करना, अच्छा न्यूट्रिशन बनाए रखना, रोजाना एक्सरसाइज करना और बहुत ज्यादा ठंड से बचना सीओपीडी को बढ़ने से रोक सकता है।
उन्होंने बताया कि एक बार सीओपीडी हो जाने पर यह ठीक होने की संभावना न के बराबर है। उन्होंने आगे कहा कि सर्दियों के महीनों में अक्सर इंफेक्शन होते हैं जिससे मरीजों को अस्पताल जाना पड़ता है।
दोगुना हुई मरीजों की संख्या
डॉक्टर कहते हैं कि सामान्य दिनों में 300 के करीब मरीज आते हैं। मौसम बदलने के बाद यह संख्या 500 से 700 तक पहुंच गई। अस्पताल के ओपीडी में सीओपीडी और अस्थमा के साथ-साथ चेस्ट इन्फेक्शन के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। पहले से करीब दोगुने मामले सामने आ रहे हैं। रोजाना करीब 500-700 के बीच मरीज ओपीडी में आ रहे हैं। लोगों से खासकर बच्चों और बुजुर्गों से अपील है कि वह सुबह और शाम के समय बाहर कम निकलें और अगर निकले भी तो गर्म कपड़े पहनें और मुंह ढककर निकलें।
बंद कमरों में बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर के इस्तेमाल को लेकर दी चेतावनी
कश्मीर में स्वास्थ्य पेशेवरों ने बंद और खराब वेंटिलेशन वाले कमरों में बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर के इस्तेमाल के खिलाफ एडवाइजारी की है। चेतावनी दी गई है कि ऐसे डिवाइस से कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) पॉइजनिंग के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं और मौत भी हो सकती है।
स्वास्थ्य विभाग के एक सीनियर डॉक्टर ने कहा कि बिना वेंटिलेशन वाले हीटर कमरे के अंदर फ्यूल जलाते हैं जिसमें नुकसानदायक गैसों के लिए चिमनी या आउटलेट नहीं होता है। इससे धीरे-धीरे जहरीले पदार्थ जमा होने लगते हैं। खासकर कार्बन मोनोऑक्साइड। बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर कंबशन बायप्रोडक्ट्स सीधे कमरे में छोड़ते हैं। जब कार्बन मोनोऑक्साइड एक तय लेवल से ज्यादा बनता है तो लोगों को सीओ पॉइजनिंग का ज्यादा खतरा होता है खासकर सोते समय। उन्होंने जोर देकर कहा कि सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि इन हीटरों से पूरी तरह बचें। ऐसे वेंटेड मॉडल चुनें जो एमिशन को घर के बाहर ले जाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोग बिना वेंट वाले हीटर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें बेडरूम, बाथरूम या किसी भी बंद जगह पर उन्हें चलाने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे हीटर का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर करना चाहिए जहां वेंटिलेशन का सही फ्लो हो। रात में बंद कमरों में उनका इस्तेमाल करना बहुत खतरनाक है।
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर में जैसे-जैसे तापमान में गिरावट आ रही है, घाटी के अस्पतालों में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और अस्थमा के मरीजों के भर्ती होने की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
डॉक्टरों ने कहा कि सर्दियों के दौरान ज्यादातर इमरजेंसी और कैजुअल्टी के मामले सीओपीडी से जुड़े होते हैं। यह फेफड़ों की एक ऐसी बीमारी है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता और जो बढ़ती रहती है। ये ज्यादातर धूम्रपान और बिगड़ते वायु प्रदूषण की वजह से होती है। उन्होंने इस क्षेत्र में रोकथाम, जल्दी डायग्नोसिस और बेहतर रेस्पिरेटरी केयर सुविधाओं की मांग की।
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छाती की बीमारियों के एक्सपर्ट डॉ. नवीद ने बताया कि घाटी में सीओपीडी के मामले खतरनाक दर से बढ़ रहे हैं। धूम्रपान छोड़ना इस जिंदगी भर चलने वाली बीमारी को रोकने का सबसे असरदार कदम है। काफी संख्या में ऐसे लोग जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, उन्हें भी खराब एयर क्वालिटी के संपर्क में आने से सीओपीडी हो जाता है। कश्मीर में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। जलने से होने वाले एमिशन, इंडस्ट्रियल एक्टिविटी, घरों में लकड़ी और केरोसिन जलाने, बायोमास फ्यूल और यहां तक कि कांगड़ी में इस्तेमाल होने वाले चारकोल के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है।
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डॉ. नवीद के अनुसार धूम्रपान दर कम करने और ओवरऑल एयर क्वालिटी में सुधार करने से सांस की बीमारियों के मामलों में काफी कमी आएगी। उन्होंने प्रशासन से ठोस कदम उठाने की अपील की। उन्होंने लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी जैसे धूम्रपान छोड़ना, एलर्जी और सांस की तकलीफ वाली चीजों से बचना, पानी का अच्छा सेवन करना, अच्छा न्यूट्रिशन बनाए रखना, रोजाना एक्सरसाइज करना और बहुत ज्यादा ठंड से बचना सीओपीडी को बढ़ने से रोक सकता है।
उन्होंने बताया कि एक बार सीओपीडी हो जाने पर यह ठीक होने की संभावना न के बराबर है। उन्होंने आगे कहा कि सर्दियों के महीनों में अक्सर इंफेक्शन होते हैं जिससे मरीजों को अस्पताल जाना पड़ता है।
दोगुना हुई मरीजों की संख्या
डॉक्टर कहते हैं कि सामान्य दिनों में 300 के करीब मरीज आते हैं। मौसम बदलने के बाद यह संख्या 500 से 700 तक पहुंच गई। अस्पताल के ओपीडी में सीओपीडी और अस्थमा के साथ-साथ चेस्ट इन्फेक्शन के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। पहले से करीब दोगुने मामले सामने आ रहे हैं। रोजाना करीब 500-700 के बीच मरीज ओपीडी में आ रहे हैं। लोगों से खासकर बच्चों और बुजुर्गों से अपील है कि वह सुबह और शाम के समय बाहर कम निकलें और अगर निकले भी तो गर्म कपड़े पहनें और मुंह ढककर निकलें।
बंद कमरों में बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर के इस्तेमाल को लेकर दी चेतावनी
कश्मीर में स्वास्थ्य पेशेवरों ने बंद और खराब वेंटिलेशन वाले कमरों में बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर के इस्तेमाल के खिलाफ एडवाइजारी की है। चेतावनी दी गई है कि ऐसे डिवाइस से कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) पॉइजनिंग के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं और मौत भी हो सकती है।
स्वास्थ्य विभाग के एक सीनियर डॉक्टर ने कहा कि बिना वेंटिलेशन वाले हीटर कमरे के अंदर फ्यूल जलाते हैं जिसमें नुकसानदायक गैसों के लिए चिमनी या आउटलेट नहीं होता है। इससे धीरे-धीरे जहरीले पदार्थ जमा होने लगते हैं। खासकर कार्बन मोनोऑक्साइड। बिना वेंटिलेशन वाले गैस हीटर कंबशन बायप्रोडक्ट्स सीधे कमरे में छोड़ते हैं। जब कार्बन मोनोऑक्साइड एक तय लेवल से ज्यादा बनता है तो लोगों को सीओ पॉइजनिंग का ज्यादा खतरा होता है खासकर सोते समय। उन्होंने जोर देकर कहा कि सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि इन हीटरों से पूरी तरह बचें। ऐसे वेंटेड मॉडल चुनें जो एमिशन को घर के बाहर ले जाएं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोग बिना वेंट वाले हीटर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें बेडरूम, बाथरूम या किसी भी बंद जगह पर उन्हें चलाने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे हीटर का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर करना चाहिए जहां वेंटिलेशन का सही फ्लो हो। रात में बंद कमरों में उनका इस्तेमाल करना बहुत खतरनाक है।