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'बाढ़ में मर जाते तो अच्छा था' पढ़ें, दिल दहलाने वाली कहानी

Fri, 21 Nov 2014 05:49 PM IST
Updated Fri, 21 Nov 2014 05:49 PM IST
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special story on flood victim naseema in kashmir

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में इन दिनों चुनावी फिजा है, लेकिन घाटी में बहुत से लोग अब भी बाढ़ की मार से नहीं उबर पाए हैं। उनका कहना है कि मुसीबत के समय प्रशासन की गैर मौजूदगी ने उन्हें निराश किया है।

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हमने बारामूला में बाढ़ पीड़ित महिलाओं की आपबीती सुनी और पूछा कि आखिर क्यों सरकार से उनका विश्वास उठ गया है?

बारामूला जिले के दिवर गांव में नसीमा अपने परिवार के साथ टारपोलीन शीट से बने टैंट में बैठी हैं। उनका खुद का घर बगल में ही है लेकिन वो इस कदर तहस-नहस है कि अंदर पांव रखने की भी जगह नही है।
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घर की छत गिर चुकी है और पंखा जमीन पर धूल खा रहा है। खिड़की-दरवाज़े मिट्टी से लदे हैं और उनमें से निकली नुकीली कीलें बाढ़ का कहर बयान करती हैं।

अपने घर में पड़े मलबे को हटाते हुए नसीमा के पैर में कील गड़ जाती है और खून बहने लगता है, लेकिन वो आह तक नहीं करती।

'उसके मुकाबले तो ये मामूली सा दर्द है'

special story on flood victim naseema in kashmir

खून को अपने मट-मैले हाथों से साफ करते हुए वे कहती हैं, 'जो सितंबर की बाढ़ के दौरान हमने झेला, उसके मुकाबले तो ये मामूली सा दर्द है।'

नसीमा के परिवार ने बाढ़ के दौरान घर से कुछ 300 मीटर दूर पहाड़ी पर खुले आसमान के नीचे दस दिन गुज़ारे। उस भयावह अनुभव को याद करते हुए नसीमा कहती हैं, 'पहाड़ी से अपनी आंखों से अपने आशियाना जब डूबता हुआ दिखता था तो मन बहुत आहत होता था।

उन दस दिनों में हमारी दो पल के लिए भी आंख नहीं लगी।' वो बताती हैं 'परिवार के बच्चों को ठंड से बचाने के लिए हम महिलाएं उन्हें 24 घंटे सीने से लगाए रखती थीं, लेकिन फिर भी मेरी बहन के एक साल के बच्चे ने दम तोड़ दिया।

उसे दफनाने के लिए रहमो-खुदा से जंगल में थोड़ी सी सूखी जमीन नसीब हो गई।'

'अच्छा होता उस सैलाब में मर जाते'

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जिस दिन बाढ़ आई नसीमा और उनका परिवार उनकी मां को अस्पताल से लेकर लौट रहा था। कुछ दिनों पहले ही उनकी मां के पैर में ऐसी चोट लगी कि वे विकलांग हो गईं।

उन्हें व्हीलचेयर पर रख जैसे-तैसे नसीमा और उनके परिवार ने उन्हें पहाड़ी पर चढ़ाया। आने वाले दिन उनके लिए जहन्नुम से कम नहीं थे, खासतौर से परिवार की महिलाओं के लिए।

नसीमा ने बताया, 'उन दिनों हमारे पास वैसे ही ठंड से बचने के लिए पूरे कपड़े नहीं थे, लेकिन महावारी के आने से महिलाओं को अपने तन से कपड़े कम कर उन्हें पैड की तरह इस्तेमाल करना पड़ा।'

निराश नसीमा कहती हैं, 'अच्छा होता अगर हम सभी उस सैलाब में मर जाते। ऐसी ज़िंदगी से तो मौत ही बेहतर है। आखिरकार कुछ समाज-सेवी संस्थाओं ने हम महिलाओं को हाईजीन किट मुहैया करवाई।'

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'हम वोट नहीं डालेंगे, न मैं और न ही मेरा परिवार'

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अपनी नम आंखों को पोंछते हुए वो गुस्से में कहती हैं, 'क्या सरकार को हमारी परेशानी दिखाई नहीं देती? इतनी निराशा के बाद अब मेरा सरकार पर से विश्वास से उठ गया है। हम वोट डालने नहीं जाएंगे, न मैं और न ही मेरा परिवार।'

नसीमा प्रकृति के प्रकोप से इतनी नाराज नहीं, जितनी की सरकार के रवैये से। चुनाव से ज्यादा उन्हें अपने गुजर-बिसर की चिंता है।

थोड़े ही दिनों में कश्मीर में बर्फबारी होने वाली है और सिर ढकने के लिए एक टैंट के अलावा नसीमा और उनके परिवार का कोई ठिकाना नहीं है।

रात को पूरा परिवार कंबल के चीथड़ों में एक-दूसरे से चिपट कर सोता है। लेकिन बर्फबारी के आगे ये चीथड़े बेहद कम पड़ जाएंगे।

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