बहुत कुछ कहता है इन हिंसा प्रभावित राज्यों में भारी मतदान
दोनों राज्यों के हालात एक-दूसरे से अलग हैं, पर दोनों जगह एक तबका ऐसा है जो चुनावों को निरर्थक साबित करता है। इस लिहाज से भारी मतदान होना वोटर की दिलचस्पी को प्रदर्शित करता है।
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों ने चुनाव के बहिष्कार का आह्वान किया था और झारखंड में माओवादियों का डर था। दोनों राज्यों में भारी मतदान हुआ। यूं भी सन 2014 को देश में भारी मतदान के लिए याद किया जाएगा। साल का अंत भारतीय लोकतंत्र के लिए कुछ अच्छी यादें छोड़कर जा रहा है।
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पिछले 25 साल का सबसे भारी मतदान इस बार हुआ है। सन 2002 के विधान सभा चुनावों ने कश्मीर में नया माहौल तैयार किया था, पर घाटी में मतदान काफी कम होता था। पर इस बार कहानी बदली हुई है। इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहले और दूसरे दौर का मतदान था। दोनों में 71 फीसदी से ज्यादा वोट पड़े।
बहिष्कार की अपील का असर नहीं
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की राजनीति पिछले 25 साल से आतंकी हिंसा के साए में है। अलगाववादी हुर्रियत के दोनों धड़ों ने इस चुनाव के बहिष्कार का एलान किया था। अब तक हुए ज्यादातर चुनावों में उनकी अपील का असर देखा गया है, पर इस बार वोटर ने उनकी अपील पर ध्यान नहीं दिया।
कश्मीर में अलगाववादी राजनीति के भीतर भी कई प्रकार की विचारधाराएं काम करती हैं। इस बार का चुनाव अलगाववादियों को इस बात के लिए मजबूर करेगा कि वे अपनी रणनीति पर फिर से विचार करें।
इस चुनाव के ठीक पहले अली शाह गिलानी ने कहा था कि सन 1987 के बाद से चुनाव बहिष्कार हमारे आंदोलन की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चुनाव में भारी मतदान के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि मुझे इसका अंदेशा था।
चुनाव ने पैदा किए थे हुर्रियत में मतभेद
सन 2002 में नरमपंथी धड़ों के साथ अनौपचारिक वार्ता एक बार ऐसे स्तर तक पहुँच गई थी कि उस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में हुर्रियत के हिस्सा लेने की सम्भावनाएं तक पैदा हो गईं।
और उस पहल के बाद मीरवाइज उमर फारूक और सैयद अली शाह गिलानी के बीच तभी मतभेद उभरे और हुर्रियत दो धड़ों में बँट गई। उस वक्त दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और राम जेठमलानी के नेतृत्व में कश्मीर कमेटी ने इस दिशा में पहल की थी।
कश्मीर कमेटी एक गैर-सरकारी समिति थी, पर माना जाता था कि उसे केंद्र सरकार का समर्थन प्राप्त था। सरकार हुर्रियत की काफी शर्तें मानने को तैयार थी, फिर भी समझौता नहीं हो पाया। पर इतना जाहिर हुआ कि अलगाववादी खेमे के भीतर भी मतभेद हैं।
कांग्रेस और बीजेपी का भविष्य
इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम देश के दो राष्ट्रीय दलों के भविष्य को खासतौर से प्रभावित करेंगे। कांग्रेस पार्टी की इन दोनों राज्यों की सत्ता में किसी न किसी रूप में भागीदारी रही है। यह साल कांग्रेस के लिए पराभव का संदेश लेकर आया।
दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के छह महीने बाद क्या कांग्रेस अपनी गिरावट को रोकने में कामयाब होगी? इसका जवाब इस चुनाव में मिलेगा। दूसरी ओर बीजेपी इन दोनों राज्यों में अलग-अलग तरीक़े से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रयास में है।
जम्मू-कश्मीर में उसका ‘मिशन 44+’ और झारखंड में पहली बार ग़ैर-गठबंधन सरकार बनाने का इरादा है।
बीजेपी का कश्मीर-स्वप्न
कश्मीर में बीजेपी का स्वप्न बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी लगता है। देश के मुस्लिम बहुल राज्य में क्या बीजेपी सरकार सम्भव है? इस स्थिति तक वह तभी पहुँच सकती है, जब कश्मीर घाटी की 46 सीटों का बड़ा हिस्सा उसे मिले, जो सम्भव नहीं लगता।
लगता यह है कि बीजेपी की जीत के अंदेशे को टालने के लिए ही घाटी में भारी मतदान हुआ है। अलबत्ता यह देखना रोचक होगा कि क्या भविष्य में पीडीपी और बीजेपी के बीच समझौता हो सकता है।
गैर-भाजपा राजनीति का भविष्य
कांग्रेस पार्टी ने हाल में गैर-भाजपा विपक्ष को एक करने की कोशिश की है। पिछले दिनों बिहार के उपचुनावों में उसने आरजेडी और जेडीयू के साथ गठबंधन भी किया।
लेकिन झारखंड में कांग्रेस का झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ गठबंधन नहीं बना। इसकी परिणति इस चुनाव में देखने को मिलेगी। झारखंड राज्य की स्थापना सन 2000 में हुई थी। राज्य में सन 2004 और 2009 के बाद से यह तीसरा चुनाव है।
राज्य की राजनीतिक शक्तियाँ इस प्रकार से विभाजित हैं कि यहाँ सरकार हमेशा अस्थिर रहती है। पिछले चौदह साल में यहाँ नौ बार सरकारें बदलीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
क्या इस बार कोई स्थिर स्थायी सरकार बनने वाली है। अभी तक इस राज्य में हर बार मुख्यमंत्री जनजातीय पृष्ठभूमि का होता है। इस बार क्या गैर-जनजातीय पृष्ठभूमि का मुख्यमंत्री बनेगा, यह भी देखना है।