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कश्मीर में बढ़ता मतदान वंशवाद की राजनीति में गिरावट का संकेत : डॉ. जितेंद्र
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कहा - वे दिन लद गए जब इस्लामाबाद से घाटी में हड़ताल का आह्वान किया जाता था
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। पीएमओ में मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कश्मीर में बढ़ता मतदान प्रतिशत घाटी में वंशवाद की राजनीति में गिरावट का संकेत है। कुछ सालों पहले तक कश्मीर में 10 प्रतिशत या उससे कम मतदान में लोग लोकसभा और राज्य विधानसभा के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए बाध्य थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। वंशवाद से प्रेरित राजनीतिक दलों ने घाटी में कभी सच्चा लोकतंत्र आने नहीं आने दिया।
कश्मीर में तीन दशक से अधिक समय तक चुनाव पाक प्रायोजित आतंकवाद के साये में होते रहे और यह वंशवादी क्षेत्रीयता के अनुकूल था। कश्मीर घाटी की राजनीतिक दल बंदूक के डर से सीमित मतदान तक सीमित थे। मैंने एक बार संसद में सुझाव दिया था कि किसी संसद सदस्य के निर्वाचित होने की मान्यता के लिए मतदाता मतदान की कुछ न्यूनतम सीमा होनी चाहिए। यह हास्यास्पद था कि कश्मीर में 17 से 18 लाख मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र में कभी कुछ हजार वोट ही डाले जाते थे। वह दिन चले गए
हैं जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद से कश्मीर में हड़ताल का आह्वान किया जाता था और श्रीनगर के लाल चौक पर दुकानें बंद हो जाती थीं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पहली बार जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद शुरू करने की पहल की गई। दशकों से कश्मीर घाटी के वंशवाद संचालित राजनीतिक दल स्वशासन या स्वायत्तता के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाते रहे। संविधान में 73वें, 74वें संशोधन पेश किए गए जिससे पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों को आत्म-सशक्तिकरण मिला।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। पीएमओ में मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कश्मीर में बढ़ता मतदान प्रतिशत घाटी में वंशवाद की राजनीति में गिरावट का संकेत है। कुछ सालों पहले तक कश्मीर में 10 प्रतिशत या उससे कम मतदान में लोग लोकसभा और राज्य विधानसभा के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए बाध्य थे। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। वंशवाद से प्रेरित राजनीतिक दलों ने घाटी में कभी सच्चा लोकतंत्र आने नहीं आने दिया।
कश्मीर में तीन दशक से अधिक समय तक चुनाव पाक प्रायोजित आतंकवाद के साये में होते रहे और यह वंशवादी क्षेत्रीयता के अनुकूल था। कश्मीर घाटी की राजनीतिक दल बंदूक के डर से सीमित मतदान तक सीमित थे। मैंने एक बार संसद में सुझाव दिया था कि किसी संसद सदस्य के निर्वाचित होने की मान्यता के लिए मतदाता मतदान की कुछ न्यूनतम सीमा होनी चाहिए। यह हास्यास्पद था कि कश्मीर में 17 से 18 लाख मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र में कभी कुछ हजार वोट ही डाले जाते थे। वह दिन चले गए
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हैं जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद से कश्मीर में हड़ताल का आह्वान किया जाता था और श्रीनगर के लाल चौक पर दुकानें बंद हो जाती थीं। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पहली बार जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद शुरू करने की पहल की गई। दशकों से कश्मीर घाटी के वंशवाद संचालित राजनीतिक दल स्वशासन या स्वायत्तता के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाते रहे। संविधान में 73वें, 74वें संशोधन पेश किए गए जिससे पंचायतों और अन्य स्थानीय निकायों को आत्म-सशक्तिकरण मिला।
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