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गिलानी और अलगाववाद : पाकिस्तान ने कर लिया था किनारा, इसीलिए छोड़नी पड़ी थी हुर्रियत
Thu, 02 Sep 2021 01:38 AM IST
दुष्यंत शर्मा
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 02 Sep 2021 01:38 AM IST
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सार
- 370 हटने के बाद घाटी में विरोध-प्रदर्शन व हिंसा न करवा पाना सीमापार के आकाओं को लगा नागवार
- अलगाववादी मुहिम को और लगा तगड़ा झटका, 27 साल तक हुर्रियत से रहे थे जुड़े
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सैयद अली शाह गिलानी और शाह महमूद कुरैशी
विस्तार
कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के निधन से घाटी में अलगाववादी मुहिम को और तगड़ा झटका लगा है। तीन दशक तक घाटी में अलगाववाद तथा हिंसा का बीज बोने वाले गिलानी की अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में हिंसा न करवाना सीमापार के आकाओं को नागवार लगा। इसके बाद पाकिस्तान ने उनसे किनारा कर लिया और अंतत: गिलानी को हुर्रियत छोड़नी पड़ी।
पाकिस्तान के दरकिनार करने पर 27 साल बाद गिलानी ने जून 2020 में हुर्रियत कांफ्रेंस से नाता तोड़ लिया। पाकिस्तान को लगने लगा था कि अब उनकी उपयोगिता नहीं रह गई है। इस वजह से वह धीरे-धीरे गिलानी के सिर से हाथ उठाते गए। इसी बीच उनकी मर्जी के खिलाफ पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत प्रमुख का चुनाव किया जाना भी गिलानी को नागवार गुजरा था।
370 हटने के बाद पाकिस्तान को भरोसा था कि हुर्रियत घाटी को दोबारा हिंसा की आग में झोंकने में सफल रहेगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो किसी अलगाववादी नेता ने किसी प्रकार के बंद का आह्वान किया, न पत्थरबाजी हुई और न ही पाकिस्तान के झंडे लहराए गए। इस सबसे पाकिस्तान बुरी तरह हताश हुआ। इसके बाद वह गिलानी को नजरअंदाज करने लगा। अपनी अहमियत कम होता देख गिलानी ने अपने को हुर्रियत से अलग कर लिया।
दरअसल हुर्रियत की एक कॉल पर घाटी में बंद हो जाती थी। हैदरपोरा स्थित आवास पर नजरबंदी के बाद भी गिलानी के नाम से फतवे जारी होते थे। 2016 में हिजबुल सरगना बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी में कई महीनों तक हिंसा का दौर चलता रहा। आरोप है कि अलगाववादियों के इशारे पर ही सारा तानाबाना बुना जाता था। पहली बार छात्राओं को भी पत्थरबाजी में झोंका गया।
घर से तहरीक-ए-हुर्रियत का बोर्ड भी हटा दिया था
हुर्रियत पर प्रतिबंध का प्रस्ताव केंद्र को भेजे जाने के बीच बीते रविवार (22 अगस्त) को तो गिलानी के हैदरपोरा आवास पर लगा तहरीक-ए-हुर्रियत का बोर्ड भी उतार दिया गया था। बताते हैं कि किसी प्रकार की कार्रवाई से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है। आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन 31 जुलाई 1993 को किया गया और गिलानी उसके चेयरमैन बने। सितंबर 2003 में आतंकवाद, बातचीत तथा भविष्य की रणनीतियों के मुद्दे पर हुर्रियत में विवाद हुआ और यह दो फाड़ हो गई।
घाटी में हिंसा के लिए अलगाववादी ताकतों का सहारा
हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के जुलाई 2016 में मारे जाने के बाद घाटी को हिंसा की आग में झोंकने के लिए भी अलगाववादी ताकतों का सहारा लिया गया था। एनआईए ने जांच में पाया था कि पीडीपी युवा नेता वहीद उर रहमान पारा ने पांच करोड़ रुपये गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश को दिए थे। फंटूश को घाटी में हिंसा और पथराव का दौर जारी रखने के लिए कहा गया था।