बाढ़ 2014: साल गुजरा पर जख्म अभी भी गहरा
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साल गुजर गया, लेकिन जख्म इतना गहरा है कि उसे भरने में शायद वर्षों भी कम पड़ जाए। अपनों के जिंदा दफन होने और आशियाने जमींदोज होने का वह खौफनाक मंजर याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
उन भयानक यादों से नींद उड़ जाती है। ऐसे दर्द बयां कि उस सद्दल गांव के पीडि़तों ने जिन्हें सितंबर माह में आई आपदा ने उजाड़ कर रख दिया। कड़ाके की ठंड में भी वे टेंटों या फिर इधर-उधर समय काटने को मजबूर हैं।
आर्य समाज उधमपुर में एकल विद्यालय अभियान के तहत सहायता राशि प्राप्त करने पहुंचे पीडि़तों की आंखों में आज भी उस खौफ का मंजर साफ स्पष्ट नजर आ रहा था। आपदा ने कई के पूरे परिवार को ही निगल लिया।
खुद को बड़ी मुश्किल से हौसला देती करीब 70 साला धामी देवी ने बताया कि उसका हंसता-खेलता पूरा परिवार ही इस हादसे की भेंट चढ़ गया। वह घर पर मौजूद नहीं थी, जिससे वह बच गई। लेकिन हादसे के वक्त घर में मौजूद उसके परिवार का एक बच्चा तक नहीं बच पाया।
अभी भी दस लोगों के शव नहीं मिले
सद्दल गांव में हुए भूस्खलन की चपेट में तबाह हुए परिवार अपने आपको संभालने की कोशिश में जैसे-तैसे जिंदगी गुजार रहे हैं। अब तक उसके पास सिवाय उनकी यादों के जीने का और कोई भी सहारा नहीं बचा है।
इस मौके पर मौजूद गांव के पीडि़त परिवारों के सदस्य अवतार कृष्ण, कपूर चंद, धामी देवी, कु लदीप आदि ने बताया कि सितंबर माह की वह काली रात भूलाए नहीं भूली जाती।
रात में हुए भूस्खलन ने पूरे गांव के साथ ही चालीस लोगों की जिंदगियों को भी मौत के आगोश में पहुंचा दिया। जिसमें अभी भी दस लोगों के शव नहीं मिले हैं। इस घटना ने सद्दल गांव के 46 परिवारों के 248 लोगों को बेघर भी कर दिया।
सद्दल गांव पर कुदरत का कहर इस कदर टूटा कि पूरा का पूरा गांव पल भर में ही जमींदोज हो गया। लेकिन कुदरत ने उनको वो गहरे व कभी न भूलने वाले जख्म दिए हैं जिनकी उन्होने कभी सपने मे भी कल्पना नही की होगी।