अपनों की याद आते ही फट पड़ता है कलेजा
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धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में 25 वर्ष पहले कई कश्मीरी पंडितों ने आतंकवाद की आग में अपनों को गंवाया था। आज जब यह लोग पुराने दिनों को याद करते हैं तो इनका कलेजा फट पड़ता है।
इन परिवारों का कहना है कि आज कश्मीरी पंडितों को बसाने के लिए जिस प्रकार राजनीति की जा रही है, इसने जख्मों को हरा कर दिया है।
वर्ष 1992 में पिता को खोने वाली जॉली कौल व उनके पति रमेश कौल ने बताया कि 1990 में जब कश्मीर में आतंकवाद शुरू हुआ था तो उनके पिता राधा कृष्ण पंडिता ने अपने पिता को छोड़कर किसी तरह से पूरे परिवार को उधमपुर सुरक्षित पहुंचाया।
1992 में वे अपने पिता को लेने के लिए वापस कश्मीर के अनंतनाग जिले में गए। वह पिता के साथ घर पर थे और दूसरे दिन निकलना था। शाम करीब चार बजे कुछ लोग आए और उनके पिता को अपने साथ ले गए।
दूसरे दिन शव फंदे पर लटकता मिला
दूसरे दिन उनका शव करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर फंदे पर लटकता मिला। आतंकवादियों ने उनके पिता को बेरहमी से मार डाला था। जाली कौल ने बताया कि जब वह दिन याद आता है तो आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं लेते हैं।
यह एक ऐसा दर्द है जो कि बार बार उभरता है। रमेश कौल ने कहा कि कश्मीरी पंडित नेताओं के लिए फुटबाल बन चुके हैं। हर कोई इनको सिर्फ लात ही मारने का काम कर रहा है।
कश्मीर में बाढ़ आती है तो केंद्र सरकार अपने खजाने खोल देती है, लेकिन अभी तक कश्मीरी पंडितों को बसाने के लिए कोई काम नहीं हो पाया है।
बबिता धर ने बताया कि 90 के दशक में आतंकवादियों ने उनकी बहन रजनी, जीजा शादीलाल रैना व दो बच्चों की बर्बरता के साथ हत्या कर दी थी। रजनी के पति जम्मू कश्मीर पुलिस में वायरलेस आपरेटर थे।
ऐसे जख्म, जो कभी नहीं भरेंगे
26 जनवरी की रात थी। दीदी अपने परिवार के साथ कमरे में सो रही थी कि रात को आतंकवादी घर घुसे और अंधाधुंध गोलियां बरसाकर पूरे परिवार को खत्म कर दिया। यह कुछ ऐसे जख्म हैं, जो कभी नहीं भर सकेंगे।
रमेश कुमार पंडिता ने बताया कि 2003 में आतंकवादी पुलवामा व अनंतनाग जिले के मध्य में पड़ते गांव माड़ीगढ़ में पहुंचे और 23 लोगों को घरों से बाहर निकालकर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर मार डाला।
इस नरसंहार में उनके परिवार से पिता, दो भाइयों की पत्नियां व दो बच्चों की मौत हो गई थी। 1990 से 2003 तक आतंकवाद से लड़ते रहे, लेकिन 2003 में आतंकवाद से हार गए और मजबूर होकर कश्मीर छोड़कर जम्मू पहुंच गए।
आज तक सभी अपनों को गवाकर विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं। समय आ गया है कि सरकार राजनीति बंद करके कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ अच्छा करे, जिससे की उनके जख्म भर सकें।