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...और पगडंडी बन गई 'मौत का रास्ता'

Fri, 10 Apr 2015 11:46 PM IST
Updated Fri, 10 Apr 2015 11:46 PM IST
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near loc agricultural field turns into deadly area

विभाजन की रेखा खिंची तो लगा कि नई सुबह में अमन शांति का माहौल होगा। लेकिन यह सब भ्रम था। मुसीबतें कम होने के बजाय और बढ़ गईं। पाक की नापाक हरकत के चलते सरहद की दीवार की नींव कमजोर होने के बजाय और मजबूत होती होती चली गई। उस पार के गर्म हवा के झोंकों में अगर कोई ज्यादा झुलसा है, तो वह हैं सीमावर्ती ग्रामीण।

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एक जख्म भरता नहीं कि दूसरे की पीड़ा सताने लगती है। कारगिल युद्ध के दौरान सीमा पर खेतों में बारूदी सुरंगें बिछाईं तो दुश्मन के लिए गई थीं, लेकिन वह बाद में स्थानीय ग्रामीणों के लिए ही मुसीबत बन गईं। इस तरह सीमावर्ती ग्रामीणों को दोहरी मार पड़ी। खेतों में बारूदी सुरंगें लगाते समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आगे चलकर यह कितनी बड़ी परेशानी साबित होंगी।
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दुश्मन से दो-दो हाथ करने के मामले में तो यह कदम ठीक था, लेकिन बाद में इनकी वजह से जहां खेतीबाड़ी चौपट हो गई, वहीं दूसरी तरफ जान को भी खतरा उत्पन्न हो गया। रोटी की खातिर खेतों में काम करने पहुंचे किसान देखते-देखते गंभीर हालत में अस्पताल में पहुंचने लगे।

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पगडंडी पर नजर आने लगी मौत

near loc agricultural field turns into deadly area

दहशत का आलम इस कदर बना कि जिन खेतों की पगडंडी पकड़ किसान रोजी-रोटी की उम्मीद बांधता था, वह मौत का रास्ता नजर आने लगी। यहां तक कि मवेशियों को भी ग्रामीणों ने खेतों की ओर ले जाना बंद कर दिया। दहशत का यह माहौल अरनिया, आरएस पुरा, अखनूर, रामगढ़, सांबा सेक्टर में कुछ समय पहले तक रहा।

दरअसल सेना ने जो बारूदी सुरंगें लगाई थीं, बारिश और बाढ़ की स्थिति में अपनी जगह से इधर-उधर हुईं। इसकी वजह से उनका सही जगह पता लगना मुश्किल हो गया। सेना ने अपने प्रयास के तहत काफी हद तक बारूदी सुरंगों को हटा दिया था। इसके बावजूद कुछ बारूदी सुरंगें खेतों में रह गईं, जिनकी चपेट में खेतीबाड़ी करने पहुंचे किसान आते रहे।

अरनिया के अला गांव, काकू दे कोठे, पिंडी चारका ऐसे गांव हैं, जिनसे कुछ मीटर आगे खेतों में बारूदी सुरंगें लगाई गई थीं। इसकी वजह से देर तक दहशत का माहौल बना रहा।

मार्गों को भी कर दिया गया था बंद

near loc agricultural field turns into deadly area

पाक के दुस्साहस को रोकने के लिए क्षेत्र में डेढ़ से दो किलोमीटर तक खेतों में बारूदी सुरंगें लगाई गई थीं। इसमें करीब पच्चीस गांवों की खेत आई थी। वहीं मुख्य मार्गों को कटीले तारों से बंद कर दिया गया था। कसबा व अला गांव की भूमि पुराने सुरक्षा बांध के उस पार होने के चलते दोनों गांव के किसानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।

ग्रामीण बाबू राम, जनक सिंह, ओम प्रकाश, गिरधारी लाल, पूर्व सरपंच सौदागर मल ने कहा कि ऐसा कोई खेत नहीं था, जहां से खूंटे पर बंधे मवेशियों के लिए चारा लाया जा सके। बताते चलें कि बारूदी सुरंगों की चपेट में आकर पांच लोग टांगें गंवा चुके हैं, जबकि नंदपुर गांव के एक नागरिक की मौत हो चुकी है।

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