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नेशनल अवार्ड से सम्मानित चला रहा है ऑटो, घर चलाने के लिए मास्टरपीस तक बेचा

Sun, 09 Sep 2018 12:21 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Updated Sun, 09 Sep 2018 12:21 AM IST
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National Award winner Ejaz ahmad shah drive Auto in srinagar
प्रतीकात्मक तस्वीर

जम्मू कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में एजाज अहमद शाह नामी एक पेपरमाशी हुनर के माहिर हैं। उन्हें नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन आज वे हालात के आगे मजबूर होकर ऑटो चला रहे हैं।

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श्रीनगर के पुराने शहर के हवाल इलाके के रहने वाले एजाज ने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए पेपरमाशी का हुनर सीखा है। वह इस हुनर में काफी महारत रखते हैं। उन्हें वर्ष 2008 में इस हुनर को लेकर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हाथों मास्टर क्राफ्टपर्सन नेशनल अवार्ड भी मिला है। इसके अलावा एजाज को रियासत से दो अवार्ड के साथ-साथ साउथ अफ्रीका, अंडमान निकोबार में अंतरराष्ट्रीय अवार्ड भी मिल चुके हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में बुरा वक्त उस समय शुरू हुआ जब 2010 में पिता को बोन कैंसर की बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया। उनके इलाज के लिए एजाज को अपनी जुटाई संपत्ति के साथ-साथ मास्टरपीस बॉक्स मात्र 30 हजार रुपयों में बेचना पड़ा। एजाज की जिंदगी में कोई सुधार न आने पर उसने अपने परिवार का पेट पालने और बच्चों की पढ़ाई के लिए ऑटो चलाना शुरू कर दिया।
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एक छोटे से दो कमरों के मकान में रहने वाले एजाज अहमद पत्नी मसरत बेगम के साथ अपने बीते समय को याद कर काफी दुखी होते हैं, लेकिन इन मुश्किल हालात के बावजूद भी मसरत शौहर के साथ कांधे से कांधा मिलाकर खड़ी हैं। मसरत का कहना है कि मुझे और मेरे बच्चों को कई बार दुख होता है कि इनके पास इतना हुनर होकर भी इन्हें वो सब न मिल पाया जिसके वह हकदार थे। पेपरमाशी से घर नहीं चल पा रहा था, इसलिए मजबूरी में आटो चलाना पड़ रहा है, लेकिन उम्मीद है कि उनकी जिंदगी में सुधार जरूर आएगा। 
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हर जगह धक्के खाए
सरकार की ओर से नेशनल अवार्डी को नौकरी दी जाती है, लेकिन मुझे कई बार हैंडीक्राफ्ट दफ्तर के चक्कर काटने पर भी मायूसी ही हाथ लगी। नामी कहते हैं कि मुझे कहा गया कि आप मैट्रिक पास नहीं हो। मुझे कोई यह बताए कि अगर मुझे पढ़ना ही होता तो मैं हुनर कहां सीखता। मैंने इस हुनर में एमए किया है और नेशनल अवार्डी भी हूं। मुझे कहीं ट्रेनर की नौकरी दी जाती, जिस हुनर में मुझे महारत हासिल है मैंने तो केवल वही सिखाना था। उसके साथ पढ़ाई का क्या लेना देना है।

शर्म से छुपाना पड़ता है चेहरा
एजाज के अनुसार वह सुबह नमाज पढ़कर 5 बजे घर से निकलते हैं और रात 10 बजे लौटते हैं। वह कभी दिन में 500 तो कभी 700 कमा लेते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें रोजाना शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, क्योंकि जब कोई अपना देखता है तो मैं मुंह छुपा लेता हूं कि कहीं कोई यह न कह दे कि एक नेशनल अवार्डी ऑटो चला रहा है। अपना यह दर्द बयान करते हुए एजाज रो पड़े और कहा कि कल को बच्चों की शादी करनी है वो कहेंगे ऑटो वाला है। एजाज ने कहा कि वो मजबूरी के चलते ऑटो चला रहे हैं।


कश्मीर में कारीगरों का बुरा हाल
ये कहानी अकेले एजाज की नहीं। कश्मीर में पेपरमाशी के साथ-साथ लकड़ी पर नक्काशी, कालीन बुनना, शॉल बनाने आदि जैसे कई कारीगर अपना असली काम छोड़ कर रोजी रोटी के लिए और कुछ काम कर रहे हैं।  अगर उनके काम को सरकारी तौर पर बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं तैयार किया गया तो वो दिन दूर नहीं कि आने वाली पीढ़ियां इन सब कलाओं को छोड़कर कुछ और करने पर मजबूर हो जाएंगी।

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