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जिंदगी के लिए दूसरे राज्यों की दौड़
ब्यूरो/अमर उजाला, जम्मू
Updated Wed, 22 Apr 2015 05:19 PM IST
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जम्मू संभाग में अंग प्रत्यारोपण पर कछुआ चाल की तरह काम हुआ है। मरीजों को अंग प्रत्यारोपण के लिए दूसरे राज्यों के अस्पतालों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है। जीएमसी में आई बैंक (नेत्र) का ढांचा तैयार कर लिया गया है, लेकिन उसे शुरू करने का काम कागजों तक ही सीमित है।
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इसी तरह सुपर स्पेशलिटी के नेफरोलाजी विभाग में हर साल किडनी के मरीजों की संख्या बढ़ रही है, मगर किडनी प्रत्यारोपण की कोई सुविधा नहीं है। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल एंड साइंस (स्किम) अस्पताल में सरकार किडनी प्रत्यारोपण पर सब्सिडी भी दे रही है।
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जीएमसी के दूसरे फ्लोर पर आई बैंक का निर्माण किया गया है। नेशनल ब्लाइंड कंट्रोल प्रोग्राम के तहत निर्माणाधीन इस नेत्र बैंक से लोग नेत्रदान कर सकेंगे, लेकिन बैंक को चालू करने में कई चुनौतियां भी हैं। इसके लिए आई बैंक आर्गन एक्ट में मेडिकल कालेज जम्मू और उसके आपथोमोलाजी विभाग को एमसीआई से पंजीकृत होना पड़ेगा।
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इस सारी प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। जीएमसी में 1990 के दशक में राष्ट्रीय स्तर के एक अभियान में कार्नियल (नेत्र) ट्रांसप्लांट की सुविधा शुरू की गई थी। लेकिन समय के साथ यह भी दम तोड़ गई। जीएमसी के अधीक्षक डा. रविंद्र रतनपाल के अनुसार आई बैंक को शुरू करवाने पर काम हो रहा है।
इसी तरह सुपर स्पेशलिटी में हर माह चार सौ से अधिक किडनी मरीजों के डायलेसिस किए जा रहे हैं। हर साल दो हजार से ज्यादा किडनी के मरीज पहुंच रहे हैं। इसमें 25-40 आयु वर्ग के किडनी क्रोनिक फेलियर मरीजों की तादाद बढ़ी है।
ऐसे मरीजों को डायलेसिस के सहारे कुछ समय रखा जाता है, लेकिन स्थायी चिकित्सा के लिए किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, मगर प्रत्यारोपण की सुविधा न होने से ऐसे मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है।