नए गिलानी बनना चाहते हैं मसर्रत आलम?
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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की मुश्किलें खत्म होती नहीं दिख रही हैं। ताजा मामला कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के स्वागत रैली में पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने और पाकिस्तान का झंडा फहराने का है।
हुर्रियत कांफ्रेंस के एक धड़े के नेता गिलानी दिल्ली में सर्दियां बिताने के बाद घाटी वापस आए हैं। उनका स्वागत किया एक अन्य अलगाववादी नेता मसर्रत आलम बट ने किया।
मसर्रत अभी पिछले महीने ही जेल से रिहा हुए थे उनकी रिहाई पर भी काफ़ी विवाद हुआ था। पुलिस का कहना है कि उसने गिलानी, बट और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ 'भड़काऊ गतिविधियों' के लिए मामला दर्ज कर लिया है।
कश्मीर में होता आया है
कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी झंडा फहराना और उसके समर्थन में नारे लगना कोई नई बात नहीं है। यह 1953 से ही होता आया है जब भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को जेल भेजा गया था।
इस बार ये मुद्दा ज्यादा चर्चा में इसलिए है, क्योंकि भाजपा सत्ता में साझीदार है। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अलगाववादियों के खिलाफ कड़ी बयानबाज़ी की थी और नेशनल कांफ़्रेंस और पीडीपी दोनों पर 'भारत विरोधी' तत्वों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाया था।
भाजपा नेता कहते रहे हैं कि पीडीपी 'नरम अलगाववाद' को बढ़ावा देती रही है। अब भाजपा उसी पीडीपी के साथ जम्मू-कश्मीर की सत्ता में है। भाजपा पर अलगाववादियों के खिलाफ कार्रवाई करने का बहुत ज्यादा दबाव है।
मुफ्ती ने शुरू की नई बहस
ऐसे में, दोनों दलों के गठबंधन वाली सरकार का नेतृत्व कर रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद मुसीबत में फंसे दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि वो कहते रहे हैं कि अलगाववादियों को शामिल करके ही 'कश्मीर मुद्दे के हल का रास्ता' साफ होगा।
अभी यह देखना बाकी है कि क्या सरकार गिलानी और अन्य के खिलाफ दर्ज मामले को आगे बढ़ाती है या नहीं। लेकिन इस घटना से यह बहस शुरू हो गई कि क्या कश्मीर में पाकिस्तान-समर्थक गुट ताकतवर हुआ है।
यहां हमेशा ही ऐसा एक समूह रहा है जो जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में शामिल होने का समर्थन करता रहा है, लेकिन यह समूह हमेशा अल्पसंख्यक ही रहा है।
ऐसी रैलियों में ये नारे, जरूरी नहीं कि पाकिस्तान के समर्थन में ही लगाए गए हों। हाल-फिलहाल कश्मीरी नौजवानों ने कुछ ऐसे नारे गढ़ लिए हैं जिनसे सरकार बुरी तरह चिढ़ जाती है।
कुछ महीने पहले चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के झंडे भी कुछ जगहों पर लहराते हुए देखे गए।
गिलानी की जगह लेने की कोशिश
पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने की घटना का मतलब है कि मसर्रत खुद को गिलानी के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने के लिए रस्साकशी कर रहे हैं, क्योंकि उम्र अब गिलानी का साथ नहीं दे रही है।
गिलानी एक खास राजनीतिक सोच (पाकिस्तानपरस्ती) के लिए जाने जाते हैं। उनके किसी अनुयायी में उनके जैसा करिश्मा नहीं है, जो ऐसा विचार रखने वाले सभी लोगों को एकजुट रख सके।
मसर्रत आलम बट की कोशिश है कि वो खुद को गिलानी से ज्यादा तेज-तर्रार पेश कर सकें। गिलानी जो जगह खाली करेंगे उसे भरने के लिए ये बट की सोची-समझी गणित का हिस्सा भी हो सकता है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)