कर्नल समेत 6 जवानों के कोर्ट मार्शल पर मुहर
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मछेल फर्जी मुठभेड़ में तीन युवाओं की मौत के मामले में दो सैन्य अफसरों समेत छह जवानों की उम्र कैद की सजा बरकरार रहेगी। उत्तरी कमान के जीओसी डीएस हुड्डा ने इसकी पुष्टि की है। वर्ष 2010 में हुई मुठभेड़ के मामले में सैन्य कोर्ट ने सभी को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी।
सैन्य प्रवक्ता (उत्तरी कमान) कर्नल एसडी गोस्वामी ने बताया कि पिछले साल नवंबर में सैन्य कोर्ट ने तत्कालीन कमांडिंग अफसर कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन ओपिंदर, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफलमैन अब्बास हुसैन को सजा सुनाई थी।
कानूनी सैन्य कार्यवाही पूरी होने के बाद सभी छह दोषियों को अब जेल अथारिटी को सौंप दिया जाएगा। आरोपी इस केस में हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं।
कैसे हुआ फर्जी मुठभेड़ का खुलासा
मामला उस वक्त प्रकाश में आया, जब 30 अप्रैल 2010 को मुठभेड़ में मारे गए तीन युवकों को सेना ने आतंकी करार दिया था। सेना का कहना था कि तीनों युवक उत्तरी कश्मीर के मछेल सेक्टर से घाटी में घुसपैठ की कोशिश कर रहे थे।
बाद में कहा गया था कि मारे गए तीनों आतंकी पाकिस्तानी हैं। उनके पास से हथियार मिलने का भी सेना ने दावा किया था। जबकि जम्मू कश्मीर पुलिस ने मारे गए तीनों युवकों को बेरोजगार बताया था।
पुलिस के अनुसार तीनों युवक मोहम्मद शफी, शहनाज अहमद और रियाज बारामुला के नादिहाल इलाके के रहने वाले थे। पुलिस का कहना था कि युवाओं को पोर्टर के रूप में रोजगार देने के लिए ले जाया गया और बाद में उन्हें गोली मार दी गई।
15 लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की थी
पुलिस ने जुलाई 2010 में इस मामले में छह सैनिकों सहित नौ लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की थी। लेकिन, मामले की जांच सेना को सौंपनी पड़ी। सेना ने निष्पक्ष एवं स्वच्छ जांच का आश्वासन भी दिया था।
फर्जी मुठभेड़ मामले में पुलिस ने टेरिटोरियल आर्मी (टीए) के जवान व दो अन्य को गिरफ्तार भी किया था। बावजूद इसके कश्मीर में लगातार हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें कुल 110 लोगों की मौत हो गई।
मुठभेड़ में पुलिस द्वारा दो स्थानीय नागरिकों बशीर अहमद लोन और अब्दुल हमीद सहित टीए के जवान अब्बास हुसैन को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
टाइम लाइन
30 अप्रैल 2010 - कुपवाड़ा जिले के मछेल सेक्टर में एलओसी के पास सेना ने तीन युवकों को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया। सेना ने उन्हें पाकिस्तानी आतंकी बताया।
01 मई 2010 - श्रीनगर सहित कश्मीर घाटी में युवाओं की मौत पर प्रदर्शन शुरू हो गए।
11 जून 2010 - श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके में प्रदर्शन के दौरान आंसू गैस का गोला लगने से क्रिकेट खेल रहे 17 वर्षीय तुफैल अहमद मट्टू की मौत हो गई। इसके बाद प्रदर्शन हिंसक हो गया था।
अगस्त - घाटी में हालात खराब होने पर कर्फ्यू लगा दिया गया। कश्मीर घाटी में रैपिड एक्शन फोर्स को उतारा गया।
13 सितंबर - कर्फ्यू के बावजूद लोगों ने एक स्कूल में आग लगा दी। इसमें 13 नागरिकों और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। 45 प्रदर्शनकारी जख्मी हो गए। पुंछ में कई सरकारी इमारतों और वाहनों को आग लगा दी गई।
15 सितंबर - तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जम्मू-कश्मीर में आल पार्टी मीटिंग का प्रस्ताव दिया। तमाम अलगाववादी नेताओं को आमंत्रित किया गया। केंद्र से 39 सदस्यीय दल पहुंचा। सरकार ने गिरफ्तार सभी प्रदर्शनकारी युवकों को रिहा करने और प्रभावितों को आर्थिक मदद देने की घोषणा की।
17 सिंतबर - पिंजौरा में प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिसकर्मी के घर में आग लगा दी।
18 सिंतबर - अनंतनाग में एक प्रदर्शनकारी की शव यात्रा में भाग लेने के बाद कर्फ्यू में लोगों ने हिंसक प्रदर्शन किया। पुलिस फायरिंग में एक की मौत और पांच जख्मी हो गए।
मई से सितंबर 2010- पत्थरबाजी व हिंसक प्रदर्शन में 110 लोगों की मौत और 537 लोग घायल हो गए। इस अवधि में 1274 सीआरपीएफ के जवान और 2747 पुलिसकर्मी जख्मी हुए।
13 नवंबर 2014 - आर्मी समरी जनरल कोर्ट मार्शल ने इस मामले में दो अफसरों सहित छह को उम्र कैद की सजा सुनाई।