झंडे पर बवाल के बाद मुफ्ती ने वापस लिया आदेश
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रियासती झंडे के उपयोग को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से एक दिन पहले जारी सर्कुलर वापस ले लिया गया। आधिकारिक प्रवक्ता के अनुसार 12 मार्च 2015 को इस संबंध में जारी सर्कुलर के ड्राफ्ट को सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया था।
इसलिए उक्त सर्कुलर को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाता है। सर्कुलर जारी करने की परिस्थितियों की जांच के बाद उचित प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। उल्लेखनीय है कि सामान्य प्रशासन विभाग आयुक्त/सचिव एमए बुखारी ने इस बाबत वीरवार को जारी दिशा-निर्देश में कहा गया था कि संवैधानिक संस्थानों और मंत्रियों के वाहनों पर रियासती झंडा लगाना अनिवार्य है।
राष्ट्रीय ध्वज के साथ संयुक्त रूप से रियासती झंडे को न फहराना जम्मू-कश्मीर प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू स्टेट ऑनर्स एक्ट, 1979 के तहत रियासत के झंडे का अपमान माना जाएगा।
सरकारी पक्ष को अदालत में नहीं रखा गया
आदेश में कहा गया था कि सभी संवैधानिक प्राधिकारी राष्ट्रीय झंडे की तरह हर कीमत पर रियासती झंडे की पवित्रता और सम्मान को बनाए रखें। प्रवक्ता के अनुसार 11 दिसंबर 2013 को हाईकोर्ट में एक याचिकाकर्ता ने रियासत के संविधान के लागू होने के दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाने के निर्देश देने का आग्रह किया था।
साथ ही सभी संवैधानिक प्राधिकारियों को अधिकारिक वाहनों, कार्यालयों और इमारतों पर रियासती झंडा फहराकर उसकी पवित्रता को बहाल रखने के निर्देश दिए जाएं। प्रवक्ता के अनुसार इस संबंध में अदालत द्वारा तलब किए गए सरकारी पक्ष को अभी अदालत में नहीं रखा गया है।
कोर्ट ने याचिका की अगली सुनवाई या उससे पहले पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया है। भाजपा के मुख्य प्रवक्ता सुनील सेठी ने जम्मू कश्मीर के झंडे को प्रदर्शित करने के सामान्य प्रशासनिक विभाग के सर्कुलर को विवाद को न्याय संगत नहीं बताया है।
'1952 से ऐसा ही होता आया है'
सेठी ने शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन में कहा कि 1952 के दिल्ली समझौते की चतुर्थ क्लाज में स्पष्ट है कि ऐतिहासिक कारणों से जम्मू कश्मीर का अपना झंडा है। इसको राष्ट्रीय ध्वज के साथ प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
क्लाज में यह भी साफ किया गया है कि राज्य का झंडा राष्ट्रीय ध्वज का प्रतिद्वंद्वी नहीं है और राष्ट्रीय ध्वज को जम्मू कश्मीर में भी वही सम्मान मिलना चाहिए जोकि देश के अन्य हिस्सों में मिलता है।
उन्होंने कहा कि कानून में अब भी यही स्थिति है और सर्कुलर के माध्यम से इसे ही अधिसूचित किया गया है। सर्कुलर में कोई नया प्रावधान या कानून नहीं है।
सेठी ने कहा कि रियासत में कुछ सियासी पार्टियां और संगठन इसे बेवजह विवाद में खींचने की कोशिश कर रहे हैं जबकि 1952 से ही जम्मू कश्मीर में सभी पूर्ववर्ती सरकारें और सभी मंत्री और विधायक ऐसा करते आ रहे हैं।