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Yasin Malik punishment : विस्थापन के गुनहगार यासीन मलिक की सजा पर कश्मीरी पंडितों की नजर

Thu, 19 May 2022 04:39 AM IST
दुष्यंत शर्मा बृजेश कुमार सिंह, जम्मू  
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू   Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 19 May 2022 04:39 AM IST
सार

अब तक 804 की हत्या पर एक में भी सजा नहीं, तीन दशक बाद जगी न्याय की उम्मीद। यासीन के गुनाह कबूलने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में आज से सजा पर होनी है बहस। 

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Kashmiri Pandits eye the punishment of displacement convict Yasin Malik
यासीन मलिक - फोटो : ani

विस्तार

प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेके एलएफ) के आतंकी यासीन मलिक की सजा का कश्मीरी पंडितों को बेसब्री से इंतजार है। सभी गुनाह कबूलने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में 19 मई से सजा पर शुरू हो रही बहस से पंडितों को आस जगी है कि तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद शायद उन्हें न्याय मिल सके। कश्मीर को आतंकवाद की आग में झोंकने वाले और मासूमों-महिलाओं को दरबदर करने वाले को उसकी किए की सजा मिल सकेगी। 

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कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार नब्बे के दशक से लेकर अब तक 804 कश्मीरी पंडितों (12 मई को प्रधानमंत्री पैकेज मुलाजिम राहुल भट समेत) की आतंकियों ने हत्या कर दी है, लेकिन एक भी मामले में दोषियों को सजा नहीं मिल सकी है। यह पहला मामला होगा जब किसी गुनहगार की सजा पर मुहर लग सकेगी। 
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कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का कहना है कि दुर्भाग्य यह है कि जिन 804 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई उनमें से ज्यादा मामलों की प्राथमिकी में अज्ञात आतंकियों का जिक्र है। इनमें से लगभग 90 फीसदी हत्याएं जेकेएलएफ के आतंकियों ने की। सरकारी तंत्र की ओर से इसकी जांच की जहमत भी नहीं उठाई गई। उस समय यासीन मलिक जेकेएलएफ का कमांडर हुआ करता था। सर्वोच्च न्यायालय से उसे सजा देने का सभी पंडितों को इंतजार है क्योंकि उन्हें पहली बार लगेगा कि किसी गुनहगार को उसके किए की सजा मिली है। समिति का कहना है कि अब भी घाटी में साढ़े आठ हजार कश्मीरी पंडित रहते हैं। 
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आतंकवाद के चरम दौर में भी श्रीनगर के साथ ही बारामुला, पुलवामा, शोपियां, अनंतनाग, बडगाम, गांदरबल, कुलगाम, गांदरबल, कुपवाड़ा और बांदीपोरा में कई परिवारों ने घाटी नहीं छोड़ी। वे अपनी मातृभूमि से जुड़े रहे और रोजी-रोटी का जुगाड़ करते रहे। लेकिन हालिया टारगेट किलिंग की घटनाओं ने एक बार फिर भय का वातावरण पैदा किया है। फिर नब्बे के हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

समिति का कहना है कि ऐसे में घाटी में रहने वाले प्रधानमंत्री पैकेज के कर्मचारियों समेत सभी कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा का खास बंदोबस्त किया जाना जरूरी है। तमाम कश्मीरी पंडित सुरक्षा की दृष्टि से अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि सजा का एलान होने पर उनके कलेजे को ठंडक पहुंचेगी। उस दिन लगेगा कि सरकार पंडितों के प्रति थोड़ी गंभीर हुई है। क्योंकि अभी तक तो इस दिशा में कुछ भी नहीं हुआ है। 



जेकेएलएफ ने ही पंडितों को विस्थापन के लिए किया था विवश: वैद
जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी डॉ. एसपी वैद बताते हैं कि 1989 के आखिर व 1990 के शुरूआत में जेकेएलएफ ही एकमात्र आतंकी संगठन था। उसी ने पंडितों को विस्थापित होने के लिए मजबूर किया। यह संगठन कश्मीर की आजादी का नारा देता था, जो पाकिस्तान को पसंद नहीं था क्योंकि वह कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जेकेएलएफ की ओर से घाटी के हालात खराब कर दिए जाने के बाद पाकिस्तान ने हिजबुल को प्रश्रय देना शुरू कर दिया।

इसके बाद जेकेएलएफ ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। टेरर फंडिंग से लेकर अन्य आतंकी घटनाओं में शामिल हो गया। जेकेएलएफ आतंकियों ने ही न केवल कश्मीरी पंडितों बल्कि देशभक्त मुस्लिमों पर भी हमले किए। उनका कहना है कि यासीन मलिक की सजा से पूरी घाटी में आतंकवाद के पारिस्थितिकी तंत्र (इको-सिस्टम) को जबर्दस्त झटका लगेगा। तीस साल पहले ऐसी व्यवस्था थी कि ऐसे लोग हीरो बन जाते थे, लेकिन अब उन्हें सजा का सामना भी करना पड़ेगा।  

घाटी में आतंकवाद का बीज जेकेएलएफ ने ही बोया
घाटी में आतंकवाद का बीज जेकेएलएफ ने ही बोया है। शुरूआत में पाकिस्तान ने इस संगठन को प्रश्रय दिया। घाटी में जब हालात खराब हो गए तो उसने हिजबुल मुजाहिदीन को आगे कर दिया। इस बीच कश्मीरी पंडितों को विस्थापन के लिए मजबूर होना पड़ा। सबसे पहले 1989 में आतंकियों ने भाजपा नेता टीका लाल टपलू की हत्या की।

इस घटना के लगभग डेढ़ महीने बाद सेवानिवृत्त जज नीलकंठ गंजू की हरि सिंह स्ट्रीट में चार नवंबर 1989 को आतंकियों ने हत्या कर दी। यह हत्या आतंकी मकबूल भट को फांसी की सजा सुनाए जाने के बदले में की गई, क्योंकि गंजू ने ही उसे एक इंस्पेक्टर की हत्या मामले में सजा सुनाई थी। हालांकि, इस हत्या की प्राथमिकी में अज्ञात आतंकियों का जिक्र है, लेकिन बताते हैं कि इसमें यासीन मलिक और जावेद मीर नलका शामिल थे।


मलिक ने एक टीवी इंटरव्यू में हत्या की बात कबूल भी की थी। आठ दिसंबर 1989 को गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का यासीन मलिक व अन्य आतंकियों ने अपहरण कर लिया। बदले में विभिन्न जेलों में बंद पांच खूंखार आतंकियों को छोड़ना पड़ा था। इसमें नलका भी था।

इस घटना के लगभग डेढ़ महीने बाद 25 जनवरी 1990 को यासीन मलिक व जेकेएलएफ के अन्य आतंकियों ने श्रीनगर में वायुसेना के जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग की। इसमें चार की मौत हो गई, जबकि 40 अन्य घायल हो गए। इन दोनों मामलों में कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है। 2017 में एनआईए ने टेरर फंडिंग के मामले में यासीन मलिक को गिरफ्तार किया तभी से वह तिहाड़ जेल में है। हाल ही उसने अपने सभी जुर्म कबूल कर लिए हैं।

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