कारगिल गाथा: चोटियों के ऊपर मिले पाकिस्तान के बनाए वार स्टोर
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भारतीय सेना के जबरदस्त जवाबी हमलों से दबाव में आई पाकिस्तानी सेना कारगिल युद्ध की रणभूमि को छोड़ चुकी थी। लेकिन घुसपैठियों की मौजूदगी का अंदेशा भी बना हुआ था। सेना की स्पेशल फोर्स के छह पैरा ने एक पैरा के साथ मिलकर मश्कोह घाटी के प्वाइंट 4745 सहित किरड़ी नार्थ के पश्चिमी हिस्से पर कब्जा हासिल कर लिया।
सात पैरा ने बकरवाल चोटी पर धावा बोला और प्वाइंट 4700 को अपने कब्जे में ले लिया। इन पर्वतीय चोटियों पर पहुंची भारतीय सेना की टुकड़ियों को बड़े पैमाने पर असलहा और युद्ध के लिए बनाए जाने वाले स्टोर मिले। सावधानीपूर्वक सारा असलहा बरामद कर लिया गया।
सात पैरा की टुकड़ी ने इसके बाद प्वाइंट 4690 और छह पैरा ने प्वाइंट 4905 को फिर से अपने कब्जे में लेकर तिरंगा झंडा फहरा दिया। स्पेशल फोर्स के इस हमले को देख कारगिल सेक्टर से घुसपैठियों ने पाकिस्तान वापसी तेज कर दी।
मोर्चे पर बोफोर्स ले जाते शहीद हुए थे सरतूल
सेना की 153 मीडियम रेजीमेंट में तैनात हवलदार सरतूल सिंह की पोस्टिंग पंजाब के फिरोजपुर में थी। कारगिल में पाकिस्तानी घसपैठ की जानकारी मिलते ही बटालियन को कारगिल की ओर मूव करने का आदेश मिला। बोफोर्स यूनिट में तैनात सरतूल सिंह भी उन सैनिकों में शामिल थे, जिन्हें कारगिल में रसद लेकर जाने के लिए भेजा गया।
सरतूल सिंह को कारगिल युद्ध में बोफोर्स लेकर आगे जाने की जिम्मेदारी मिली। इसी बीच कारगिल श्रीनगर हाईवे पर बोफोर्स को देखकर सेना के वाहनों पर घुसपैठियों ने गोलाबारी शुरू कर दी। सेना की कानवाई उस समय द्रास सेक्टर के उस प्वाइंट से गुजर रही थी जहां से हाईवे को सीधा निशाना बनाया गया। सरतूल सिंह दुश्मन के इसी हमले में 12 जुलाई को शहीद हो गए।
हवलदार सरतूल सिंह की बेटी सुषमा देवी ने बताया कि उन्हें गर्व है कि उनके पिता ने देश के लिए प्राणों की आहुति दी। सुषमा ने बताया कि जून महीने की शुरुआत में सरतूल सिंह अपने घर पर छुट्टी काटने आए थे। महानपुर के माड़ा पट्टी कैलड़ी में अभी छुट्टी काटते कुछ दिन ही हुए थे कि ड्यूटी पर वापस लौटने का संदेश मिल गया।
कारगिल युद्ध शुरू हो गया था और आपरेशन विजय में सरतूल को भी अहम रोल निभाना था। परिवार से मिलने के बाद सरतूल सिंह कश्मीर की ओर बढ़ने से पहले उधमपुर में पढ़ाई कर रही अपनी बेटी से भी मिले। सुषमा ने बताया कि वह आखिरी बार था जब उनके पिता से उनकी मुलाकात हुई थी। उसके बाद तो तिरंगे में लिपटा उनका शव ही घर पहुंचा।