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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Kargil Vijay Diwas: First lady Gunjan Saxena 'Cheetah' pilot of Kargil war

कारगिल युद्ध की पहली महिला 'चीता' पायलट, घायलों को पहुंचाया था अस्पताल, पाक सेना ने बनाया था निशाना

Fri, 26 Jul 2019 03:16 AM IST
Pranjal Dixit न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: Pranjal Dixit Updated Fri, 26 Jul 2019 03:16 AM IST
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Kargil Vijay Diwas: First lady Gunjan Saxena 'Cheetah' pilot of Kargil war
फ्लाइट लैंफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना - फोटो : फाइल, अमर उजाला
कारगिल विजय दिवस पर हम उन शहीदों को तो याद रखते हैं, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए। लेकिन उन्हें भूल जाते हैं, जिन्होंने पर्दे के पीछे रह कर इस जंग में अपनी महती भूमिका निभाई। फ्लाइट लैंफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन कुछ ऐसे ही लोगों में शामिल हैं। इन दोनों महिलाओं ने न केवल कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन की मिसाइलों का मुकाबला किया, बल्कि सरहद पर तैनात जवानों के लिए हेलीकॉप्टर्स से समय पर रसद भी पहुंचाई और घायल होने पर उन्हें तुरंत अस्पताल भी पहुंचाया। जिसके बाद गंजुन को अपने इस अदम्य साहस के लिए शौर्य चक्र भी मिला।
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वायुसेना के पहले बैच में शामिल

आज से 20 साल पहले वायुसेना में महिलाओं को आज की तरह फुल कमीशन नहीं दिया जाता था, बल्कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए 7 सालों तक ही देश की सेवा करने का मौका मिलता था। ऐसे में सैन्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन उन 25 ट्रेनी पायलटों में शामिल थीं, जिन्हें 1994 में भारतीय वायुसेना के पहले बैच में शामिल होने का मौका मिला। 
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कारगिल युद्ध में घायल सैनिकों को पहुंचाया अस्पताल 

फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और फ्लाइट लेफ्टिनेंट श्रीविद्या राजन को भी एक ऐसे ही मौके की तलाश थी, जहां उन्हें देश के लिए कुछ करने का मौका मिले। आखिरकार उन्हें यह मौका तब मिला जब 1999 में कारगिल जंग छिड़ी। हालांकि उन्होंने इससे पहले कभी फाइटर जेट नहीं उड़ाया था। युद्ध के दौरान जब सेना को पायलट को जरूरत पड़ी तो दोनों को कारगिल युद्ध क्षेत्र में भेजने का फैसला किया गया। सेना ने इन्हें घायल सैनिकों को लाने के साथ सप्लाई राशन भेजने और सबसे अहम युद्ध क्षेत्र में पाकिस्तानी पोजिशंस पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब दोनों को ऐसे इलाके में उड़ान भरनी थी, जहां पाकिस्तानी सेना उन्हें कभी भी अपनी मिसाइलों के जद में ले सकती थी।


छोटे चीता हेलीकॉप्टर से किए मुश्किल काम

बावजूद इसके उन्होंने इस मिशन के लिए हामी भरी और छोटे चीता हेलीकॉप्टर्स से पहली बार युद्ध क्षेत्र की उड़ान भरी। दुश्मन की तोपों और मिसाइलों के सामने चीता हेलीकॉप्टर की कोई औकात नहीं होती क्योंकि वह हथियार रहित होता है। ऐसे में दोनों के पास सेल्फ डिफेंस के लिए कुछ भी नहीं था। लेकिन दोनों ने जान की परवाह किए बगैर उत्तरी कश्मीर के खतरनाक इलाके में कई उड़ानें भरी। उस इलाके में पाक सैनिक बुलैट और मिसाइलों से ही एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर्स और एयरक्राफ्ट्स को देखते ही निशाना बना रहे थे। 

पाक सेना ने बनाया था निशाना

अपने मिशन को अंजाम देने के लिए कई बार उन्होंने लाइन ऑफ कंट्रोल के बिल्कुल नजदीक से भी उड़ान भरीं, ताकि पाकिस्तानी सैनिकों की पोजिशंस का पता लगाया जा सके। ऐसी ही वक्त में एक बार जब गुंजन उड़ान भरने के लिए कारगिल हवाई पट्टी से टेकऑफ की तैयारी कर रही थीं, तभी पाकिस्तानी सेना ने कंधे से दागी जाने वाली एक मिसाइल से उनके चॉपर को टारगेट किया। मिसाइल उनके चॉपर से लगते-लगते बची और पीछे पहाड़ी से टकरा कर फट गई। गुंजन और विद्या के लिए यह सामने मौत दिखने जैसा अनुभव था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। हर दूसरे भारतीय सैनिक की तरह, वे भी उस दिन अपने देश के लिए जान देने के लिए तैयार थीं। 


गुंजन सक्सेना


घायल सैनिकों ने बढ़ाया जज्बा

सेल्फ डिफेंस के नाम पर गुंजन के पास केवल एक इंसास राइफल और एक रिवॉल्वर ही थी, जिसका इस्तेमाल उन्हें तब करना था, अगर उनका चॉपर दुश्मन के इलाके में क्रेश हो जाता। इस दौरान उनका बस केवल एक ही मकसद था कि कैसे घायल सैनिकों को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाया जाए और यही घायल सैनिक उनके इस जज्बे को भी कायम रखे हुए थे। गुंजन का मानना है कि एक हेलीकॉप्टर के पायलट के लिए इससे अच्छा अहसास क्या हो सकता है कि जंग के दौरान घायलों को अस्पताल पहुंचा रही हैं और किसी की जान बचा रही हैं।   


शौर्य चक्र से किया सम्मानित

हालांकि बतौर चॉपर पायलट उनके साहस और दिलेरी को देखते हुए उन्हें शौर्य वीर चक्र से भी नवाजा गया। सेना से ऐसा सम्मान प्राप्त करने वाली वह पहली महिला भी बन गईं। गुंजन और श्रीविद्या को कभी भी लड़ाकू विमान उड़ाने का मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने उन लोगों के लिए रास्ता तय किया, जो पुरुषों के साथ कंधां मिला कर अपने देश के लिए लड़ना चाहते हैं। गुंजन और श्रीविद्या ने उस समय दिलेरी दिखाई जब आमतौर पर यह आम भारतीय मानसिकता है कि सेना केवल पुरुषों के लिए है। 
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