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Jammu kashmir: बलिदान दिवस पर छलका दर्द- पंडितों की हत्या पर 33 साल से जारी है सियासत और हमदर्दी का नाटक
Wed, 14 Sep 2022 04:25 AM IST
दुष्यंत शर्मा
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 14 Sep 2022 04:25 AM IST
सार
Jammu kashmir: पं. टीकालाल न केवल वकील थे, बल्कि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे। समाज सेवक भी थे। पिछले 33 साल से कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।
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बड़गाम में प्रदर्शन करते कश्मीरी पंडित... file pic
- फोटो : बासित जरगर
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विस्तार
पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के चरम के दौर में आतंकियों ने सबसे पहले कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित समुदाय के पेशे से वकील पंडित टीकालाल टपलू को निशाना बनाया। घर के बाहर जम्मू-कश्मीर लेबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ ) के आतंकियों ने 14 सितंबर 1989 को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। पं. टीकालाल न केवल वकील थे, बल्कि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और प्रदेश उपाध्यक्ष भी थे। समाज सेवक भी थे। पिछले 33 साल से कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।
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लेकिन टीकालाल के पुत्र स्थिति को इससे बिल्कुल अलग मानते हैं। उनका कहना है कि टीकालाल का नाम था इसलिए लोग उन्हें याद करते हैं, लेकिन कई और लोग भी आतंकवाद की भेंट चढ़े उनका क्या हुआ? सरकारी आंकड़ों के अनुसार आतंकियों ने 220 पंडितों की हत्या कर दी थी जिनका कोई गुनाह नहीं था उन्हें कोई नहीं याद करता। उनके परिवार का न तो सरकार और न ही किसी राजनीतिक दल ने हाल जानने की कोशिश की। वह किस प्रकार जीवनयापन कर रहे हैं। दुर्भाग्य है कि पंडितों के शव पर तो 33 साल से राजनीति चमकाई जा रही है, लेकिन वास्तव में किसी ने उनके परिवार का हाल जानने की कोशिश नहीं की।
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दिल्ली में एक निजी कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत पंडित टीकालाल के बडे़ बेटे आशुतोष टपलू उन दिनों को याद कर बताते हैं कि वह 20 साल के थे। इंजीनियरिंग अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे थे। पिता जी को हत्या का अंदेशा हो चुका था। वह परिवार को दिल्ली में छोड़कर 13 सितंबर को श्रीनगर लौटे थे। अगले दिन उनकी आतंकियों ने हत्या कर दी। उन्होंने बताया कि पिता जी ने 17 सितंबर को मुंबई में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेकर लौटते समय मां को ले जाने का वादा किया था।
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रातभर उन्हें समझाता रहा, लेकिन उनका कहना था कि वह भगोड़े घोषित नहीं होना चाहते और न ही अपने कश्मीरी समाज को अकेले छोड़ना चाहते हैं। वे एहतियात बरतते हुए रहेंगे। यह पिता जी के साथ आखिरी बात थी। उन्होंने कहा कि पिता जी काफ ी बहादुर थे। आतंकियों का मकसद टीकालाल टपलू की हत्या कर खौफ का माहौल पैदा करना था जिसमें वे कामयाब हो गए। हत्या के विरोध में मुस्लिम समाज भी आगे आया था। विरोध में राशन कार्ड तक जलाए गए थे।
कश्मीरी पंडितों के संगठन को भी कठघरे में खड़ा किया
उन्होंने सरकार और कश्मीरी पंडितों के संगठन को भी कठघरे में खड़ा किया। उनका कहना है कि किसी भी सरकार ने कभी भी आतंकवाद के दौर में मारे गए पंडितों के परिवार की सुध तक नहीं ली। एक पत्र तक नहीं लिखा गया कि वे किस हाल में हैं। मारे गए लोगों सिर्फ इतना कसूर था कि वे राष्ट्रवादी थे। कश्मीरी पंडितों के नाम पर काम कर रही तमाम संस्थाओं व संगठनों ने भी कभी आगे बढ़कर मदद करने की कोशिश नहीं की।
सरला भट को आरी से काट डाला गया था, कभी उन्हें याद किया गया? बताया कि टीकालाल के परिवार से होने के नाते उन्हें रेलवे में सरकारी नौकरी और आर्थिक मदद का ऑफ र किया गया, लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया। दिल्ली में डीडीए की ओर से फ्लैट की भी पेशकश की गई। पंडित टीकालाल फ ाउंडेशन के नाम पर किसी से कोई मदद नहीं ली गई। परिवार अपने वेतन का 20 फीसदी फाउंडेशन को देता है जिससे जितना बन पाता है उतनी जरूरतमंदों की मदद की जाती है।
कश्मीर घाटी में नहीं मनाया जाता बलिदान दिवस
कश्मीर घाटी जहां पं. टीकालाल टपलू ने बलिदान दिया वहां बलिदान दिवस नहीं मनाया जाता है। आतंकवाद के दौर में भी घाटी न छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू का कहना है कि आतंकियों का शिकार सबसे पहले 14 मार्च 1989 को बडगाम चाडूरा की प्रभावती बनी थीं। आतंकियों ने इस दिन हरि सिंह स्ट्रीट इलाके में ग्रेनेड हमला किया था जिसमें सात लोग घायल हुए थे। छह तो स्वस्थ हो गए थे लेकिन इस घटना में घायल प्रभावती ने दम तोड़ दिया था। इस घटना को कोई याद नहीं करता। बताया कि यहां कभी भी बलिदान दिवस नहीं मनाया गया लेकिन जम्मू व देश के अन्य हिस्से में लोग इसे मनाते हैं।
आज पूरे देश में मनेगा बलिदान दिवस
पंडित टीकालाल टपलू की शहादत के दिन 14 सितंबर को पूरे देश में बलिदान दिवस मनाया जाएगा। कश्मीरी पंडितों के संगठनों की ओर से जम्मू के अलावा दिल्ली, मुंबई, पुणे, बंगलूरू तथा देश के अन्य हिस्सों में जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं वे बलिदान दिवस को किसी न किसी रूप में मनाएंगे। पनुन कश्मीर के प्रवक्ता एमके धर का कहना है कि जम्मू में भी कार्यक्रम आयोजित किया गया है। इसके अलावा संस्था की ओर से देश के अन्य हिस्सों में भी इसे मनाया जा रहा है। कश्मीरी पंडित कांफ्रेंस, पनुन कश्मीर (वीरेंद्र रैना के नेतृत्व वाले), कश्मीरी पंडित यूनाइटेड फ्रंट, ऑल डिस्प्लेस्ड कश्मीरी यूनाइटेड फ्रंट, ऑल माइग्रेंट इम्प्लाइज एसोसिएशन कश्मीर आदि संगठनों ने संयुक्त रूप से काला दिवस मनाने का फैसला किया है।