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Jammu News: जम्मू-कश्मीर की जमीन के नीचे छुपा खतरा, पर्माफ्रॉस्ट पिघला तो हिल जाएगा हिमालय
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में जमीन के नीचे जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट अब धीरे-धीरे पिघल रही है और यह भविष्य में बड़े प्राकृतिक हादसों की वजह बन सकती है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पहली बार पूरे जम्मू-कश्मीर हिमालय का 21 साल का सैटेलाइट डेटा (2002 से 2023) खंगालकर पर्माफ्रॉस्ट का विस्तृत नक्शा तैयार किया गया है। इस नक्शे से यह पता चला है कि पूरे क्षेत्र का करीब 65% हिस्सा पर्माफ्रॉस्ट की पकड़ में है।
यह अध्ययन कश्मीर यूनिवर्सिटी के भू-सूचना विज्ञान विभाग के शोधार्थी इम्तियाज भट और फैसल जहूर जान, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. इरफान राशिद और आईआईटी बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर राज रमाशंकरन ने किया है। अध्ययन में सामने आया है कि 26.7 फीसदी क्षेत्र में लगातार जमी बर्फ (कंटीन्युअस पर्माफ्रॉस्ट) है, 23.8 फीसदी हिस्से में रुक-रुक कर जमी बर्फ (डिस्कॉन्टीन्युअस) और 14.3 फीसदी में छिटपुट पर्माफ्रॉस्ट है। वहीं, 35.2 फीसदी इलाके में पर्माफ्रॉस्ट नहीं पाया गया। यह अध्ययन सैटेलाइट से मिले लैंड सरफेस टेम्परेचर (एलएसटी) डेटा के आधार पर किया गया है।
लद्दाख सबसे संवेदनशील, जम्मू के तराई इलाके सुरक्षित
सैटेलाइट डेटा और जियोग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) जरिए की गई पड़ताल में पाया गया कि लद्दाख का पठारी इलाका सबसे ज्यादा संवेदनशील है। यहां 87 फीसदी क्षेत्र में पर्माफ्रॉस्ट मौजूद है, जबकि जम्मू का तराई क्षेत्र, किश्तवाड़ की शिगर घाटी और शिवालिक की पहाड़ियां इस खतरे से मुक्त हैं। अध्ययन के मुताबिक पर्माफ्रॉस्ट आमतौर पर 2886 मीटर से लेकर 8032 मीटर की ऊंचाई पर पाया गया है।
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चट्टानों की पुष्टि से मिला भरोसा, नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी
पर्माफ्रॉस्ट का पता लगाने के लिए इस अध्ययन में इलाके में मौजूद रॉक ग्लेशियर यानी चट्टानी हिमखंडों की भी मदद ली गई। अध्ययन में पाया गया कि 99.6 फीसदी रॉक ग्लेशियर उन्हीं इलाकों में हैं जहां पर्माफ्रॉस्ट मौजूद है। इससे यह भी साफ हुआ कि नक्शे की सटीकता बेहद मजबूत है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्टडी भविष्य की योजना बनाने वालों, निर्माण एजेंसियों और पर्यावरण विभागों के लिए एक चेतावनी है ताकि समय रहते ऐसे संवेदनशील इलाकों में सतर्कता बरती जाए।
पिघलती जमीन से खतरे में क्या-क्या?
सड़कें- 193 किलोमीटर लंबी सड़कें उन इलाकों में हैं जहां पर्माफ्रॉस्ट पिघलने की आशंका है।
घर- 2415 घर ऐसे क्षेत्रों में हैं जो पर्माफ्रॉस्ट से प्रभावित हो सकते हैं।
झीलें- 903 अल्पाइन झीलें, जिनमें से कई जल स्रोत और पारिस्थितिक संतुलन के लिए जरूरी हैं।
हाइड्रो प्रोजेक्ट- 8 पनबिजली परियोजनाएं, जिन पर राज्य की ऊर्जा निर्भरता टिकी है।
पर्माफ्रॉस्ट क्या है और क्यों है खतरनाक?
जमीन की वह परत जो साल भर बर्फीली और जमी हुई रहती है, उसे पर्माफ्रॉस्ट कहते हैं. यह ज्यादातर ऊंचे पहाड़ी इलाकों और ठंडी जलवायु में पाई जाती है। जलवायु परिवर्तन से जब यह बर्फ पिघलती है, तो जमीन कमजोर हो जाती है। इससे भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने, झील फटने जैसी घटनाएं होती हैं। फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुए ऋषिगंगा हादसे की वजह भी पर्माफ्रॉस्ट की अस्थिरता थी, जिसमें कई लोगों की जान गई और दो हाइड्रो प्रोजेक्ट तबाह हो गए।
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यह अध्ययन कश्मीर यूनिवर्सिटी के भू-सूचना विज्ञान विभाग के शोधार्थी इम्तियाज भट और फैसल जहूर जान, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. इरफान राशिद और आईआईटी बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर राज रमाशंकरन ने किया है। अध्ययन में सामने आया है कि 26.7 फीसदी क्षेत्र में लगातार जमी बर्फ (कंटीन्युअस पर्माफ्रॉस्ट) है, 23.8 फीसदी हिस्से में रुक-रुक कर जमी बर्फ (डिस्कॉन्टीन्युअस) और 14.3 फीसदी में छिटपुट पर्माफ्रॉस्ट है। वहीं, 35.2 फीसदी इलाके में पर्माफ्रॉस्ट नहीं पाया गया। यह अध्ययन सैटेलाइट से मिले लैंड सरफेस टेम्परेचर (एलएसटी) डेटा के आधार पर किया गया है।
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लद्दाख सबसे संवेदनशील, जम्मू के तराई इलाके सुरक्षित
सैटेलाइट डेटा और जियोग्राफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) जरिए की गई पड़ताल में पाया गया कि लद्दाख का पठारी इलाका सबसे ज्यादा संवेदनशील है। यहां 87 फीसदी क्षेत्र में पर्माफ्रॉस्ट मौजूद है, जबकि जम्मू का तराई क्षेत्र, किश्तवाड़ की शिगर घाटी और शिवालिक की पहाड़ियां इस खतरे से मुक्त हैं। अध्ययन के मुताबिक पर्माफ्रॉस्ट आमतौर पर 2886 मीटर से लेकर 8032 मीटर की ऊंचाई पर पाया गया है।
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चट्टानों की पुष्टि से मिला भरोसा, नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी
पर्माफ्रॉस्ट का पता लगाने के लिए इस अध्ययन में इलाके में मौजूद रॉक ग्लेशियर यानी चट्टानी हिमखंडों की भी मदद ली गई। अध्ययन में पाया गया कि 99.6 फीसदी रॉक ग्लेशियर उन्हीं इलाकों में हैं जहां पर्माफ्रॉस्ट मौजूद है। इससे यह भी साफ हुआ कि नक्शे की सटीकता बेहद मजबूत है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्टडी भविष्य की योजना बनाने वालों, निर्माण एजेंसियों और पर्यावरण विभागों के लिए एक चेतावनी है ताकि समय रहते ऐसे संवेदनशील इलाकों में सतर्कता बरती जाए।
पिघलती जमीन से खतरे में क्या-क्या?
सड़कें- 193 किलोमीटर लंबी सड़कें उन इलाकों में हैं जहां पर्माफ्रॉस्ट पिघलने की आशंका है।
घर- 2415 घर ऐसे क्षेत्रों में हैं जो पर्माफ्रॉस्ट से प्रभावित हो सकते हैं।
झीलें- 903 अल्पाइन झीलें, जिनमें से कई जल स्रोत और पारिस्थितिक संतुलन के लिए जरूरी हैं।
हाइड्रो प्रोजेक्ट- 8 पनबिजली परियोजनाएं, जिन पर राज्य की ऊर्जा निर्भरता टिकी है।
पर्माफ्रॉस्ट क्या है और क्यों है खतरनाक?
जमीन की वह परत जो साल भर बर्फीली और जमी हुई रहती है, उसे पर्माफ्रॉस्ट कहते हैं. यह ज्यादातर ऊंचे पहाड़ी इलाकों और ठंडी जलवायु में पाई जाती है। जलवायु परिवर्तन से जब यह बर्फ पिघलती है, तो जमीन कमजोर हो जाती है। इससे भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने, झील फटने जैसी घटनाएं होती हैं। फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुए ऋषिगंगा हादसे की वजह भी पर्माफ्रॉस्ट की अस्थिरता थी, जिसमें कई लोगों की जान गई और दो हाइड्रो प्रोजेक्ट तबाह हो गए।