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एसएचजी योजना बंद होने से 22 हजार इंजीनियर बेरोजगार
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जम्मू। प्रदेश सरकार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन पहले से स्वरोजगार प्राप्त 22 हजार के करीब इंजीनियर अब बेरोजगार हैं। 2020 में सरकार ने 17 साल पुरानी सेल्फ हेल्फ ग्रुप (एसएचजी) योजना को बंद कर दिया, जिसके कारण 22 हजार इंजीनियर अब बेरोजगार हैं। उन्हें अब सरकार से न्याय की उम्मीद है।
एसएचजी से जुड़े 22 हजार के करीब इंजीनियर को सरकार द्वारा करवाए जाने वाले निर्माण कार्यों में 30 फीसदी तक काम का कोटा तय किया था। 2020 में सरकार ने एसएचजी को बंद कर दिया। इंजीनियरों ने इसका विरोध किया तो सरकार ने तीन विभागों के प्रमुख सचिवों की अध्यक्षता में कमेटी बनाई और एसएचजी योजना को बनाए रखने की रिपोर्ट तैयार करने को कहा। कमेटी ने छह महीने पहले रिपोर्ट एलजी प्रशासन का सौंप दी थी। शुक्रवार को सचिवालय में इसको लेकर बैठक भी होनी है।
2003 में बनाई थी एसएचजी योजना
2003 में तत्कालीन पीडीपी सरकार ने प्रदेश में बेरोजगार इंजीनियरों को रोजगार देने के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप योजना शुरू की थी। एसएचजी के लिए शुरू में विभिन्न विभागों में 20 फीसदी काम का कोटा तय किया गया था, जबकि 2017 में एसएचजी के लिए काम का कोटा बढ़ाकर 30 फीसदी तक कर दिया था। एसएचजी के प्रत्येक ग्रुप में न्यूनतम पांच और अधिकतम दस इंजीनियर होते थे। इन ग्रुपों को पांच लाख से लेकर एक करोड़ 25 लाख रुपये की लागत वाले निर्माण कार्य दिए जाते थे।
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एसएचजी से जुड़े 22 हजार के करीब इंजीनियर को सरकार द्वारा करवाए जाने वाले निर्माण कार्यों में 30 फीसदी तक काम का कोटा तय किया था। 2020 में सरकार ने एसएचजी को बंद कर दिया। इंजीनियरों ने इसका विरोध किया तो सरकार ने तीन विभागों के प्रमुख सचिवों की अध्यक्षता में कमेटी बनाई और एसएचजी योजना को बनाए रखने की रिपोर्ट तैयार करने को कहा। कमेटी ने छह महीने पहले रिपोर्ट एलजी प्रशासन का सौंप दी थी। शुक्रवार को सचिवालय में इसको लेकर बैठक भी होनी है।
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2003 में बनाई थी एसएचजी योजना
2003 में तत्कालीन पीडीपी सरकार ने प्रदेश में बेरोजगार इंजीनियरों को रोजगार देने के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप योजना शुरू की थी। एसएचजी के लिए शुरू में विभिन्न विभागों में 20 फीसदी काम का कोटा तय किया गया था, जबकि 2017 में एसएचजी के लिए काम का कोटा बढ़ाकर 30 फीसदी तक कर दिया था। एसएचजी के प्रत्येक ग्रुप में न्यूनतम पांच और अधिकतम दस इंजीनियर होते थे। इन ग्रुपों को पांच लाख से लेकर एक करोड़ 25 लाख रुपये की लागत वाले निर्माण कार्य दिए जाते थे।
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