चुनावः कश्मीरी पंडित तय करेंगे भाजपा की जीत
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रियासत के चुनावों में जी-जान से जुटी भाजपा के लिए यह खबर बेशक राहत वाली हो सकती है। जानकारी के अनुसार घाटी में कश्मीरी पंडितों की संख्या में अत्प्रत्यशित रूप से वृदि्ध हुई है।
भाजपा के लिए अच्छी बात ये है कि घर लौटने वाले ये कश्मीरी पंडित ज्यादातर श्रीनगर और उसके आसपास की जगहों के रहने वाले हैं। चुनावों में भाजपा का फोकस भी कश्मीर के इन्हीं इलाकों पर है।
ऐसे में भाजपा की उम्मीद इन कश्मीरी पंडितों पर ही आ टिकी है जो उसके लिए एक बड़ा वोटबैंक साबित हो सकते हैं। वैसे भी भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय से पूरा जोर कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी पर ही लगाए हुए था, शायद इसका फल उसे मिलता भी दिख रहा है।
मई के मुकाबले 4-5 फीसदी बढ़े कश्मीरी पंडित
जानकारी के अनुसार अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनावों के मुकाबले घाटी में कश्मीरी पंडितों की संख्या चार फीसदी तक बढ़ गई है। चुनाव आयोग के आंकडों पर ही गौर करें तो घाटी में मौजूद कश्मीरी पंड़ितों का आंकड़ा फिलहाल 90 हजार तक पहुंच गया है।
जिसमें अभी और वृदिध होने की उम्मीद है। घाटी के प्रमुख अखबार The Kashmir Monitor की खबर के अनुसार 2008 के विधानसभा चुनावों में घाटी में कश्मीरी पंडितों की संख्या 72,793 थी जो गत लोकसभा चुनावों में बढ़कर 88,802 तक पहुंच गई।
वहीं बीते 30 अक्टूबर तक यह आंकड़ा 92,934 को पार कर चुका था, जिसमें अभी और बढोत्तरी होने की उम्मीद है। ऐसे में घाटी में वापस लौटे ये कश्मीरी पंडित भाजपा के लिए एक बड़ा वोट बैंक साबित हो सकते हैं।
ऐसे में भाजपा का पूरा जोर इन कश्मीरी पंडितों पर ही लगा हुआ है। सूत्रों के अनुसार आरएसएस और भाजपा के स्थानीय नेता इन्हीं कश्मीरी पंडितों से व्यक्तिगत संपर्क कर एक-एक वोट को बटोरने में लगे हैं।
चुनावों के बहिष्कार में बन सकते हैं भाजपा की संजीवनी
मौजूदा चुनावों में भाजपा जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत मानकर चल रही है। उसकी सबसे बड़ी चिंता कश्मीर को लेकर है। जहां भाजपा की उपस्थिति नाममात्र को है। ऐसे में पार्टी का सारा फोकस भी कश्मीर में ही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कश्मीर में खास रुचि ले रहे हैं, यही कारण है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से वह अब तक चार बार कश्मीर की यात्रा कर चुके हैं। दूसरी ओर घर लौटे ये कश्मीरी पंडित भाजपा की इस चिंता को दूर कर सकते हैं।
आमतौर पर घाटी में होने वाले सभी चुनावों का यहां खासा प्रभाव रखने वाले अलगाववादी विरोध करते रहे हैं। ऐसे में मतदान का आंकडा अकसर काफी कम रहता है।
गत चुनावों में श्रीनगर और इससे जुड़ी बाकी सीटों पर जीत दर्ज करने वाले उम्मीदवार भी कुल दस हजार वोट का आंकडा पार नहीं कर सके थे, ऐसे में भाजपा अगर इन 93 हजार कश्मीरी पंडितों को अपने पक्ष में करने में सफल रही तो कश्मीर में बाजी पलटने में देर नहीं लगेगी।
राजनीतिक विश्लेषक और जम्मू विवि के पालीटिकल साइंस के प्रोफेसर अनुराग गंग्गल हालांकि कश्मीरी पंडितों के रुख को लेकर बहुत ज्यादा आश्वस्त नजर नहीं आते लेकिन वह यह जरूर मानते हैं कि घाटी वापस लौटने वाले युवाओं में मोदी को लेकर क्रेज बना हुआ है। ऐसे में उनका रुख भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर सकता है।