{"_id":"60d23f1ce3339b1baf73f9a9","slug":"jammu-and-kashmir-disappointment-among-people-due-to-cancellation-of-chamliyal-fair","type":"story","status":"publish","title_hn":"जम्मू-कश्मीर : सरहद पर सौहार्द का प्रतीक चमलियाल मेला फिर रद्द होने से लोगों में मायूसी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जम्मू-कश्मीर : सरहद पर सौहार्द का प्रतीक चमलियाल मेला फिर रद्द होने से लोगों में मायूसी
Wed, 23 Jun 2021 04:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा
प्रीत चौधरी, सांबा
प्रीत चौधरी, सांबा
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 23 Jun 2021 04:07 AM IST
सार
- बाबा दलीप सिंह मन्हास की पाकिस्तान में भी बनी है मजार
- पाकिस्तानी श्रद्धालु बाबा की मजार पर चढ़ाने के लिए चादर लाते थे जो बीएसएफ के अधिकारियों को सौंपते थे। अधिकारी बाबा की मजार पर उसे चढ़ा देते थे
विज्ञापन
बाबा की दरगाह...
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
रामगढ़ की भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के गांव दग में स्थित दरगाह पर बाबा दलीप सिंह मन्हास, जिन्हें बाबा चमलियाल के नाम से जाना जाता है, हर वर्ष जून माह के अंतिम वीरवार को मेले का आयोजन किया जाता है। गत वर्ष और इस वर्ष भी कोरोना के चलते मेले का आयोजन नहीं किया गया। ऐसे में श्रद्धालुओं में मायूसी है। यह मेला भारत-पाकिस्तान के लोगों में आपसी सौहार्द बढ़ाता है।
विज्ञापन
दरगाह के बारे में बताया जाता है कि करीब 300 वर्ष पूर्व दग गांव में बाबा दलीप सिंह मन्हास रहते थे। वह चर्म रोग का उपचार करते थे। दूर दराज से लोग उनके पास आकर उपचार कराते थे। देखते ही देखते बाबा काफी मशहूर हो गए और उनके इलाज की चर्चा दूर दूर तक होने लगी। निकटवर्ती गांव के कुछ लोग उनकी ख्याति से ईर्ष्या रखने लगे और एक दिन मौका देख कर बाबा की हत्या कर दी।
विज्ञापन
उन्होंने बाबा को बहाने से किसी का इलाज कराने के लिए बुलाया। बाबा एक घोड़े से जा रहे थे, और उन्होंने पर छिपकर वार कर दिया, जिसमें बाबा का सिर सैदांबाली (अब पाकिस्तान) में गिरा जबकि उनका बाकी शरीर चमलियाल गांव में गिरा। इस तरह से दोनों स्थानों पर बाबा की मजारें बनी हुई हैं।
विज्ञापन
तालाब की मिट्टी शक्कर, कुएं का पानी शर्बत
एक दिन बाबा ने एक भक्त को रात में दर्शन दिए। बाबा ने भक्त को चंबल रोग के बारे में बताया कि चमलियाल स्थान पर एक तालाब व कुआं है। तालाब की मिटटी जिसे शक्कर बोलते हैं, कुंए के जल को शर्बत कहा जाता है। दोनों का लेप करने से चंबल रोग जड़ से चला जाएगा। अगले ही दिन भक्त ने उक्त स्थान पर पहुंच कर ऐसा ही किया। आहिस्ता-आहिस्ता इस स्थान की महत्ता दूर-दूर तक होने लगी। आज भी इस स्थान पर लोग चंबल रोग से छुटकारा पाने के लिए आते हैं और अपने शरीर पर मिट्टी का लेप लगाते हैं और रोग से छुटकारा पाते हैं।
पाकिस्तान से आते थे श्रद्धालु
बाबा की मजार पर पाकिस्तान से भी श्रद्धालु आकर माथा टेकते थे। सैदांबाली पाकिस्तान में बाबा की मजार पर भी मेला लगता है। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तानी श्रद्धालुओं का मजार पर आना बंद हो गया। उसके बाद जीरो लाइन पर दोनों देश के सुरक्षाबलों की ओर से मेले का आयोजन किया जाता था, जिसमें पाकिस्तानी रेंजर्स व सिविल प्रशासन के अधिकारी व परिवार भी मेले में शिरकत करते थे। दोनों देश के अधिकारी कुछ समय के लिए आपसी दुशमनी को भूल कर एक हो जाते थे। कुछ पल के लिए दोनों देश की दूरियां कम हो जाती थीं। आपस में उपहार भी दिए जाते थे।
पाकिस्तान से आती थी चादर
पाकिस्तानी श्रद्धालु बाबा की मजार पर चढ़ाने के लिए चादर लाते थे जो बीएसएफ के अधिकारियों को सौंपते थे। अधिकारी बाबा की मजार पर उसे चढ़ा देते थे। बीएसएफ के जवान पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को शक्कर और शर्बत देते थे। जिनका साल भर पाकिस्तानी श्रद्धालु बेसब्री से इंतजार करते थे।
कारगिल युद्ध से बढ़ गई दूरी
कारिगल युद्ध के दौरान दोनो देशों के बीच बनी खटास पर मेले का आयोजन रद्द कर दिया गया। कुछ वर्ष ऐसा ही रहा, बाद में फिर से जीरो लाइन पर मेले का आयोजन किया जाने लगा। पहले बीएसएफ की ओर से मेले का आयोजन किया जाता था। बाद में जिला प्रशासन ने अपने हाथ में इंतजाम ले लिया। तीन वर्ष पूर्व पाक रेजरों ने गोलीबारी कर बीएसएफ के अधिकारियों व जवानों को शहीद कर दिया। इस कारण मेले पर पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को शक्कर शर्बत नहीं दी गई। गत वर्ष भी कोरोना के चलते मेला स्थगित कर दिया गया। अब दूसरी बार मेले का आयोजन रद्द कर दिया गया है।