अठारह दिन तक चले सियासी ड्रामे का अंत
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जम्मू कश्मीर विधानसभा के त्रिशंकु नतीजों के बाद सियासी पार्टियों में शह और मात के अठारह दिनों तक चले सियासी ड्रामे का राज्यपाल शासन लागू होने के साथ पटाक्षेप हो गया।
राज्यपाल शासन के लागू होने के साथ ही सियासी दलों में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो गया है। राज्यपाल शासन लागू होने की आड़ में सियासी दल अपने सियासी मकसद साधने में भी लग गए है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रो. सैफुद्दीन सोज का कहना है कि राज्यपाल शासन लगने के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी सीधे तौर पर जिम्मेवार है। सोज की माने तो कांग्रेस ने पीडीपी को सरकार बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन दिया था।
स्थायी सरकार के लिए कई निर्दलीय विधायक भी समर्थन के लिए तैयार थे। स्थायी सरकार के लिए ओर क्या चाहिए था लेकिन पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस के बजाये भाजपा के नजदीक जाना बदकिस्मत से बेहतर समझा।
पीडीपी अगर कांग्रेस के साथ जाती तो राज्यपाल शासन की नौबत नहीं थी।
भाजपा चाहती है पूरे छह साल वाली सरकार
पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता र्नईम अख्तर का कहना है कि राज्यपाल शासन रियासत में जरूर लागू हुआ है लेकिन यह स्थायी व्यवस्था के तहत नहीं है।
पीडीपी रियासत के लोगों के हित में काम करना चाहती है और स्थायी सरकार के लिए पार्र्टी के प्रयास जारी रहेंगे। पीडीपी को उम्मीद है कि जल्द ही स्थायी सरकार रियासत में बनेगी।
पीडीपी इस दिशा में बातचीत जारी रखेगी। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष एवं सांसद जुगल किशोर शर्मा का कहना है कि संवैधानिक संकट की स्थिति में राज्यपाल शासन लागू हुआ है।
केयरटेकर मुख्यमंत्री के रूप में उमर अब्दुल्ला ने काम न करने की इच्छा जाहिर कर दी थी। ऐसी स्थिति में रियासत में राज्यपाल शासन के अलावा विकल्प नहीं रह गया था।
भाजपा पूरे छह साल तक चलने वाली स्थायी सरकार चाहती है और इस दिशा में पार्टी का कोर ग्रुप बैठक कर चर्चा करेगा। सरकार गठन के लिए पार्टी के पास सभी विकल्प खुले हुए है।