इसका फोटो मेल से भेजा है।अमर उजाला ब्यूरो जम्मू। देशव्यापी लॉकडाउन से प्रभावित प्रवासी श्रमिक अब तक के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। प्रतिदिन मेहनत मजदूरी कर परिवार का चलाने वाला श्रमिक अब पूरी तरह सरकार की महरबानी पर निर्भर रह गया है। प्रदेश सरकार और श्रम विभाग के दावे मजूदरी की हालात के आगे बोने साबित हो रहे है।प्रवासी श्रमिक संकट की स्थिति से गुजर रहे,कठिनाई के इस दौर में श्रमिकों तक सरकारीअमला नहीं पहुंच रहा है।शहर के बेलीचराना के स्थति झुग्गी- झपोडियों में छेत्तसीगढ़ के चार सौ के करीब श्रमिकरहते है।यहां पर इन श्रमिकों की 50 से अधिक झुग्गी- झोपड़ी है जो एक दूसरे से जुड़ी हुइै है।यहां पर सामाजिक दूरी के नियम का पालनकरना बड़ा मुश्किल है।श्रमिकों का कहना है वह कोरोना वायरस से नहीं बल्कि भुख और आर्थिक तंगी से अधिक परेशान है।पैंसा खत्म हो गया है जो पैसा कमा कर गांव में परिवार को भेजा था अब उसे वापिस मांगना पड़ रहा है।बस्ती में रहने वाले छेत्तीसगढ़ के रतन लाल,मिस्त्री का काम करते थे, लेकिन 40 दिनों सेकोई काम नहीं मिला है।जो पैंसा कमाया था वह खत्म हो गया है,अबपरिवार से पैंसा मंगवा रहे है, ताकि खुद औरबच्चों को खाना खिला सके।उन्होंने कहा कि गांव के सरपंच को नाम लिखवा लिया है, ताकि वहां की सरकार हमे घर वापिस ले सके।लखन भी छत्तीसगढ़ से है और लकड़ी का काम करते है।लखन कहते है कि एक बार पांच किलो राशन मिला था, जो कुछ दिनों में खत्म हो गय। उन्होंने कहा कि अब घर जाने चाहते है, गांव में खेती का भी समय आ गया है, वहीं पर कुछ क अगले साल वापिस आएंगे। रघुराम और गणपत ने कहा कि पैसा नहीं है, राशन भी खत्म हो रहा है, सरकारी राशन दुकान से राशन नहीं मिलता है। आर्थिक तंगी इस कदर है कि छोटे बच्चों के लिए दुध खरीद मुश्किल हो रहा है।