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सैनिक कालोनी और कश्मीरी पंडितों की कालोनी पर स्थिति स्पष्ट करे सरकार
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
Updated Fri, 27 May 2016 10:48 PM IST
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विधानसभा में बोलते उमर अब्दुल्ला
- फोटो : Amar Ujala
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पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान सरकार से कश्मीर में सैनिक कालोनी बनाने और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कालोनी बनाने पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सदन की नेता और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राज्य को अनिश्चितता के दौर से बाहर निकालना होगा।
उमर ने कहा कि इस समय रियासत में तीन ज्वलंत मुद्दे हैं। सैनिक कालोनी के मुद्दे पर सरकार ने कभी स्थिति साफ नहीं की। सरकार कभी कहती है कि सैनिक कालोनी का प्रस्ताव नहीं है तो कभी कहती है कि अब तक किसी को जमीन आवंटित नहीं की गई है। मैंने यह मुद्दा उठाया था तो मुझ पर आरोप लगाए गए।
उस वक्त भी मैंने चुनौती दी थी कि यदि मेरी बातें गलत हैं तो एफआईआर कराएं। उमर ने कहा कि उन्होंने कभी सैनिक कालोनी का विरोध नहीं किया। सिर्फ इतना जानने की कोशिश की कि कैसे राज्य के विशेष दर्जे को बचाए रखा जाएगा। जवाब में कहा गया कि यह उमर अब्दुल्ला के कार्यकाल का मामला है।
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उमर ने कहा कि हो सकता है कि उनके कार्यकाल में एजेंडा आया होगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके कार्यकाल में इसका फैसला हुआ। यदि यही माना जाता है तो फिर उनके समय शुरू किए गए कामों का श्रेय भी दिया जाना चाहिए। हाल में मुख्यमंत्री ने जीरो ब्रिज तथा टीआरसी का उद्घाटन किया। यह भी उनके कार्यकाल के काम हैं।
कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर कहा कि इस मामले में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने हमेशा कहा है कि जम्मू-कश्मीर का ख्याल रखते हुए कश्मीरियत को कायम रखना होगा। मुश्किल हालात में यहां से गए कश्मीरी पंडितों, सिखों, मुसलमानों को वापस लाना होगा।
कश्मीरी पंडितों को इज्जत से वापस लाकर उनकी जगह पर बसाना होगा। हो सकता है कि वे वहां न जाएं। तब उन्हें शहरों में बसाएं। एक चहारदीवारी के भीतर तो कतई न बसाएं क्योंकि फिर वापसी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। नई इंडस्ट्रियल पालिसी भी लाई जाती है और उसे तुरंत वापस ले लिया जाता है। इसमें भी जमीन का ही मसला है।
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उमर ने कहा कि इस समय रियासत में तीन ज्वलंत मुद्दे हैं। सैनिक कालोनी के मुद्दे पर सरकार ने कभी स्थिति साफ नहीं की। सरकार कभी कहती है कि सैनिक कालोनी का प्रस्ताव नहीं है तो कभी कहती है कि अब तक किसी को जमीन आवंटित नहीं की गई है। मैंने यह मुद्दा उठाया था तो मुझ पर आरोप लगाए गए।
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उस वक्त भी मैंने चुनौती दी थी कि यदि मेरी बातें गलत हैं तो एफआईआर कराएं। उमर ने कहा कि उन्होंने कभी सैनिक कालोनी का विरोध नहीं किया। सिर्फ इतना जानने की कोशिश की कि कैसे राज्य के विशेष दर्जे को बचाए रखा जाएगा। जवाब में कहा गया कि यह उमर अब्दुल्ला के कार्यकाल का मामला है।
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उमर ने कहा कि हो सकता है कि उनके कार्यकाल में एजेंडा आया होगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके कार्यकाल में इसका फैसला हुआ। यदि यही माना जाता है तो फिर उनके समय शुरू किए गए कामों का श्रेय भी दिया जाना चाहिए। हाल में मुख्यमंत्री ने जीरो ब्रिज तथा टीआरसी का उद्घाटन किया। यह भी उनके कार्यकाल के काम हैं।
कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर कहा कि इस मामले में भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने हमेशा कहा है कि जम्मू-कश्मीर का ख्याल रखते हुए कश्मीरियत को कायम रखना होगा। मुश्किल हालात में यहां से गए कश्मीरी पंडितों, सिखों, मुसलमानों को वापस लाना होगा।
कश्मीरी पंडितों को इज्जत से वापस लाकर उनकी जगह पर बसाना होगा। हो सकता है कि वे वहां न जाएं। तब उन्हें शहरों में बसाएं। एक चहारदीवारी के भीतर तो कतई न बसाएं क्योंकि फिर वापसी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। नई इंडस्ट्रियल पालिसी भी लाई जाती है और उसे तुरंत वापस ले लिया जाता है। इसमें भी जमीन का ही मसला है।