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Jammu News: तीन अपाहिज में दिखा दिशाहीन व्यवस्था का दंश
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नटरंग ने संडे नाटक सीरीज में तीन अपाहिज नाटक का किया मंचन
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। राजनीतिक, सामाजिक या आध्यात्मिक लक्ष्य और दिशाहीन व्यवस्था ने देश के युवाओं को असहाय ही नहीं दिव्यांंग बना दिया है। भ्रष्टाचार का संक्रमण हमारे विचारों में प्रवेश कर नए विचार और क्रांति को जन्म नहीं लेने दे रहा है। नटरंग ने इसी व्यवस्था के दंश को संडे नाटक सीरीज के तहत मंचित तीन अपाहिज नाटक में बयां किया है। नाटक के तीन पात्र खल्लू, कल्लू और गल्लू के झूठे तर्काें-कुतर्काें की लोग हंसी उड़ाते हैं। तीन अपाहिज विपिन कुमार अग्रवाल लिखित एक हास्य नाटक है, जिसका निर्देशन नीरज कांत ने किया।
नाटक की शुरुआत में दिखाया कि तीनों पात्रों कल्लू, खल्लू और गल्लू लैंप पोस्ट के नीचे बैठे हैं। वह हर चीज पर अपनी टिप्पणी और निर्णय लेते हैं। तीनों पात्र एक-दूसरे से असंगत तरीके से संवाद करते हैं, जो दर्शकों के लिए कुछ मायने नहीं रखता है। लेकिन उन्हें फिर भी यह अहसास होता है कि हमारे आसपास जो हो रहा है, उसमें कुछ तो है। उनकी बहस में आजादी के मायने, नेताओं के बेमतलब के भाषण, भारतीयता, भाषा, वर्ग, विषय है, लेकिन सब कुछ जरूरी होते हुए भी लक्ष्यहीन लगता है। जो समाज के एक बड़े वर्ग की निष्क्रियता, अर्थहीनता, भ्रम की ओर धकेल रहे हैं। वास्तव में लेखक यह दिखाना चाहता है कि आधुनिक बनने की प्रक्रिया में आज समाज अपनी मानवीय प्रकृति को भूलता जा रहा है और पूर्ण अक्षमता के युग में पहुंच चुका है। नाटक में विशाल शर्मा, अभिमन्यु चौधरी और सुमित बंद्राल ने बेहतरीन अभिनय किया है।
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जम्मू। राजनीतिक, सामाजिक या आध्यात्मिक लक्ष्य और दिशाहीन व्यवस्था ने देश के युवाओं को असहाय ही नहीं दिव्यांंग बना दिया है। भ्रष्टाचार का संक्रमण हमारे विचारों में प्रवेश कर नए विचार और क्रांति को जन्म नहीं लेने दे रहा है। नटरंग ने इसी व्यवस्था के दंश को संडे नाटक सीरीज के तहत मंचित तीन अपाहिज नाटक में बयां किया है। नाटक के तीन पात्र खल्लू, कल्लू और गल्लू के झूठे तर्काें-कुतर्काें की लोग हंसी उड़ाते हैं। तीन अपाहिज विपिन कुमार अग्रवाल लिखित एक हास्य नाटक है, जिसका निर्देशन नीरज कांत ने किया।
नाटक की शुरुआत में दिखाया कि तीनों पात्रों कल्लू, खल्लू और गल्लू लैंप पोस्ट के नीचे बैठे हैं। वह हर चीज पर अपनी टिप्पणी और निर्णय लेते हैं। तीनों पात्र एक-दूसरे से असंगत तरीके से संवाद करते हैं, जो दर्शकों के लिए कुछ मायने नहीं रखता है। लेकिन उन्हें फिर भी यह अहसास होता है कि हमारे आसपास जो हो रहा है, उसमें कुछ तो है। उनकी बहस में आजादी के मायने, नेताओं के बेमतलब के भाषण, भारतीयता, भाषा, वर्ग, विषय है, लेकिन सब कुछ जरूरी होते हुए भी लक्ष्यहीन लगता है। जो समाज के एक बड़े वर्ग की निष्क्रियता, अर्थहीनता, भ्रम की ओर धकेल रहे हैं। वास्तव में लेखक यह दिखाना चाहता है कि आधुनिक बनने की प्रक्रिया में आज समाज अपनी मानवीय प्रकृति को भूलता जा रहा है और पूर्ण अक्षमता के युग में पहुंच चुका है। नाटक में विशाल शर्मा, अभिमन्यु चौधरी और सुमित बंद्राल ने बेहतरीन अभिनय किया है।
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