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डोडा: रेवश्रधार मंदिर में अष्टमी पर मेले की धूम, सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम

Mon, 03 Oct 2022 05:09 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Mon, 03 Oct 2022 05:09 PM IST
सार

रेवश्रधार मंदिर में आठवें नवरात्र पर मेले की धूम रही। इसकी तैयारियां पहले से ही पूरी कर ली गई थीं। मेला स्थल पर सुरक्षा भी चाक चौबंद रहा और आयोजकों ने भक्तों की सुविधा के भी पूरे इंतजाम किए गए।

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Doda Ashtami mela in ancient Revashradhar Rehoshra temple devotees throng
Doda - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

डोडा के रेवश्रधार मंदिर में आठवें नवरात्र पर मेले की धूम रही। इसकी तैयारियां पहले से ही पूरी कर ली गई थीं। मेला स्थल पर सुरक्षा भी चाक चौबंद रहा और आयोजकों ने भक्तों की सुविधा के भी पूरे इंतजाम किए गए। इस स्थान पर शीतला माता का मंदिर है, जिसमें शीश नवाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

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डोडा के भद्रवाह, चिराला, भेला, ठाठरी, कारा और गंदो (भलेंसा) सहित प्रदेश के अन्य जिलों के श्रद्धालु यहां पहुंचे। वर्षों पहले भद्रवाह, चिराला और भलेंसा के लोग ही यहां माथा टेकते थे। लेकिन, एक तरफ चिराला व दूसरी तरफ भद्रवाह के चिंता (चिंचोड़ा) और जोड़ा गांव तक सड़क पहुंचने से अन्य जिलों के श्रद्धालु भी आने लगे हैं। नवरात्र में मंदिर के कपाट खुले रहते हैं। भीड़ को देखते हुए श्रद्धालु पहली नवरात्रि से ही दर्शन करते हैं।
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भद्रवाह से 43 किलोमीटर दूर है माता का भवन

स्थानीय लोगों के अनुसार भद्रवाह से करीब 43 किमी दूरी पर रेवश्रधार में शीतला माता का मंदिर सुशोभित है। यहां चारों ओर सुनसान जंगल है। मीलों का सफर तय कर लोग मां के दरबार में पहुंचते हैं। जिन इलाकों में वाहन सुविधा नहीं है, उनसे श्रद्धालु रात को पैदल चलना शुरू करते हैं। ढोल, बीन की मधुर की धुन और महामाई के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो जाता है। पुरातन प्रथा के अनुसार मंदिर में भेड़ों की बली चढ़ाई जाती है। मन्नत पूरी होने के लिए लोग बली चढ़ाने की कामना करते हैं।
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मंदिर से सटे जंगल में होती थी मुठभेड़

20 साल पहले प्रदेश के अन्य स्थानों से यहां श्रद्धालु कम आते थे। इसकी वजह आतंकवाद था। मंदिर से सटे जंगलों में अक्सर नवरात्रि में मुठभेड़ हो जाती थी। मुठभेड़ के चलते कई श्रद्धालुओं की मौत भी चुकी है। माता के भवन को भी जलाया गया था। आतंकवाद का सफाया होने के बाद श्रद्धालु निश्चिंत होकर दर्शन करते हैं। इसके लिए सुरक्षा के मजबूत प्रबंध भी किए जाते हैं।

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