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Jammu News: सदियों बाद खुलेगा बसोहली की ऐतिहासिक टकसाल का रहस्य
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टकसाल किले को जाता रास्ता।
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रावी नदी किनारे बसे बसोहली में कभी राजाओं की मुद्राएं ढाली जाती थीं
सरकार ने संरक्षण के लिए आवंटित की डेढ़ करोड़ रुपये की धनराशि
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। 1635 ईस्वी में निर्मित बसोहली के ऐतिहासिक किले और उसके निकट स्थित टकसाल का रहस्य सदियों बाद अब खुलने वाला है। लंबे समय से उपेक्षित और झाड़ियों से घिरी इस टकसाल का जीर्णोद्धार कार्य शुरू होने जा रहा है। इसके लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने डेढ़ करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है। पुरातत्व और संग्रहालय विभाग, लोक निर्माण विभाग के सहयोग से इस परियोजना को पूरा करेगा।
परियोजना के तहत टकसाल तक पहुंचने के लिए पथमार्ग (पाथ वे) का निर्माण, धरोहर को पुराने स्वरूप में लाना, बैठने की व्यवस्था, शौचालय सुविधाएं और रंग-बिरंगी रोशनी से सजावट शामिल है। इसका उद्देश्य पर्यटकों को आकर्षित करना और बसोहली के ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखना है। परियोजना के पहले चरण में लोक निर्माण विभाग कंसल्टेंसी के माध्यम से टकसाल को संरक्षित करने के लिए सुझाव लेगा, ताकि इसे पूर्वकालीन ढांचे के अनुरूप ही बहाल किया जा सके।
बसोहली: अंतरराष्ट्रीय कला नगरी
बसोहली को अंतरराष्ट्रीय कला नगरी के रूप में जाना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, रावी नदी के किनारे बसे होने के कारण यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर का एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। यहां की टकसाल न केवल मुद्रा निर्माण का केंद्र थी, बल्कि यह राजाओं की संपत्ति के संरक्षण का काम भी करती थी। शोधकर्ता शिव कुमार पाधा के अनुसार, 1635 ईस्वी में राजा भूपत पाल ने बसोहली के ऐतिहासिक किले और टकसाल का निर्माण करवाया था। उस समय यहां राजाओं की मुद्राएं ढाली जाती थीं और उनकी आय भी यहां संग्रहित की जाती थी, जिसे कड़ी सुरक्षा में रखा जाता था।
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हालांकि, समय के साथ टकसाल प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो गई। संरक्षण के अभाव में इसकी दीवारें ध्वस्त हो गईं और यह झाड़ियों के बीच छिप गई। पाधा ने बताया कि नगर कमेटी बसोहली ने एक बार टकसाल के पास शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए खुदाई भी शुरू कर दी थी, लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया।
पाधा के अनुसार, टकसाल का उचित संरक्षण न होने के कारण यह खंडहर में तब्दील हो गई। अब तक यहां पहुंचने का कोई उचित मार्ग भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि पुरातत्व विभाग इसकी खुदाई करवाए, तो यहां से प्राचीन अवशेष और मुद्राएं मिलने की संभावना है, जो क्षेत्र की धरोहर को संरक्षित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।
जम्मू-कश्मीर में धरोहर संरक्षण
जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव के लिए प्रयासरत है। बसोहली की प्राचीन टकसाल भी इन्हीं प्रयासों का हिस्सा है। इसके जीर्णोद्धार से न केवल बसोहली के समृद्ध इतिहास को संरक्षित किया जाएगा, बल्कि यह पर्यटन को भी बढ़ावा देगा।
संगीता शर्मा, सहायक निदेशक
पुरातत्व और संग्रहालय विभाग, जम्मू-कश्मीर
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सरकार ने संरक्षण के लिए आवंटित की डेढ़ करोड़ रुपये की धनराशि
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। 1635 ईस्वी में निर्मित बसोहली के ऐतिहासिक किले और उसके निकट स्थित टकसाल का रहस्य सदियों बाद अब खुलने वाला है। लंबे समय से उपेक्षित और झाड़ियों से घिरी इस टकसाल का जीर्णोद्धार कार्य शुरू होने जा रहा है। इसके लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने डेढ़ करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है। पुरातत्व और संग्रहालय विभाग, लोक निर्माण विभाग के सहयोग से इस परियोजना को पूरा करेगा।
परियोजना के तहत टकसाल तक पहुंचने के लिए पथमार्ग (पाथ वे) का निर्माण, धरोहर को पुराने स्वरूप में लाना, बैठने की व्यवस्था, शौचालय सुविधाएं और रंग-बिरंगी रोशनी से सजावट शामिल है। इसका उद्देश्य पर्यटकों को आकर्षित करना और बसोहली के ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखना है। परियोजना के पहले चरण में लोक निर्माण विभाग कंसल्टेंसी के माध्यम से टकसाल को संरक्षित करने के लिए सुझाव लेगा, ताकि इसे पूर्वकालीन ढांचे के अनुरूप ही बहाल किया जा सके।
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बसोहली: अंतरराष्ट्रीय कला नगरी
बसोहली को अंतरराष्ट्रीय कला नगरी के रूप में जाना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, रावी नदी के किनारे बसे होने के कारण यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर का एक समृद्ध राज्य हुआ करता था। यहां की टकसाल न केवल मुद्रा निर्माण का केंद्र थी, बल्कि यह राजाओं की संपत्ति के संरक्षण का काम भी करती थी। शोधकर्ता शिव कुमार पाधा के अनुसार, 1635 ईस्वी में राजा भूपत पाल ने बसोहली के ऐतिहासिक किले और टकसाल का निर्माण करवाया था। उस समय यहां राजाओं की मुद्राएं ढाली जाती थीं और उनकी आय भी यहां संग्रहित की जाती थी, जिसे कड़ी सुरक्षा में रखा जाता था।
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हालांकि, समय के साथ टकसाल प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो गई। संरक्षण के अभाव में इसकी दीवारें ध्वस्त हो गईं और यह झाड़ियों के बीच छिप गई। पाधा ने बताया कि नगर कमेटी बसोहली ने एक बार टकसाल के पास शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए खुदाई भी शुरू कर दी थी, लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया।
पाधा के अनुसार, टकसाल का उचित संरक्षण न होने के कारण यह खंडहर में तब्दील हो गई। अब तक यहां पहुंचने का कोई उचित मार्ग भी नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि पुरातत्व विभाग इसकी खुदाई करवाए, तो यहां से प्राचीन अवशेष और मुद्राएं मिलने की संभावना है, जो क्षेत्र की धरोहर को संरक्षित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।
जम्मू-कश्मीर में धरोहर संरक्षण
जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव के लिए प्रयासरत है। बसोहली की प्राचीन टकसाल भी इन्हीं प्रयासों का हिस्सा है। इसके जीर्णोद्धार से न केवल बसोहली के समृद्ध इतिहास को संरक्षित किया जाएगा, बल्कि यह पर्यटन को भी बढ़ावा देगा।
संगीता शर्मा, सहायक निदेशक
पुरातत्व और संग्रहालय विभाग, जम्मू-कश्मीर