जब हाईकोर्ट ने वकील से पूछा, क्यों न सजा दी जाए
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बहुचर्चित बडगाम सेक्स स्कैंडल में उस वक्त नया मोड़ आ गया, जब हाईकोर्ट के जस्टिस मुजफ्फर हुसैन अत्तर और जस्टिस अली मोहम्मद मार्गे की खंडपीठ ने एडवोकेट मुश्ताक अहमद के शब्दों को काफी गंभीरता से लेते हुए इसे कोर्ट की अवमानना करार दिया। स्कैंडल के आरोपी की रिहाई पर स्टे लगाते हुए खंडपीठ ने उसे जेल भेजने के आदेश दिए थे।
अदालत में एडवोकेट ने कहा था, ‘रियासत में हमारी न्यायपालिका के मामलों की यह स्थिति है।’ इस पर खंडपीठ ने वकील के शब्दों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे स्कैंडल प्रभावित होगा और न्यायपालिका जैसे संस्थान की प्रतिष्ठा घटेगी। वकील ने जब इन शब्दों का उपयोग किया तो उस वक्त अदालत खचाखच भरी थी।
अदालत ने कहा कि उन्हें ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। इससे उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। इस पर वकील ने कहा कि उन्होंने जांच अधिकारी के बयान का हवाला दिया है जबकि आईओ ने ऐसे शब्दों का उपयोग नहीं किया था। इस दौरान वकील के भाव और आचरण से उसकी कट्टरता झलकती दिखी। उसने कहा कि उनसे खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
वकील का रद्द हो सकता है लाइसेंस
खंडपीठ ने पाया कि वकील को उपयोग किए गए शब्दों का कोई पछतावा नहीं है। साथ ही हाईकोर्ट के अधीनस्थ कोर्ट के जजों को परेशान करने या न्यायिक कार्यों के निर्वहन में उनके कार्यों पर टिप्पणी से बचाना अदालत का फर्ज है। कानून की महिमा की रक्षा और न्यायालयों की गरिमा बनाए रखने को अदालत बाध्य है।
किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करने पर कोर्ट को दुख होता है, लेकिन न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने के लिए कार्यवाही करना आवश्यक हो जाता है। इसलिए अदालत वकील को नोटिस जारी कर पूछती है कि कोर्ट के समक्ष ही अवमानना करने पर क्यों न उन्हें सजा दी जाए।
इसके अलावा उनका लाइसेंस रद्द करने के लिए क्यों न स्टेट बार काउंसिल में उनका केस भेजा जाए। खंडपीठ ने रजिस्ट्री को नियम फ्रेम करने और आदेश की प्रति एडवोकेट मुश्ताक अहमद डार के अलावा स्टेट बार काउंसिल को उपलब्ध करवाने को कहा।