फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   darbar move system cost paid by governmet shifting of offices of administration from Jammu to Srinagar

दरबार मूवः सरकारी खजाने पर बोझ बनी ये व्यवस्था! अब केंद्र सरकार के पाले में गेंद

Thu, 07 May 2020 01:28 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Thu, 07 May 2020 01:28 PM IST
सार

  • अप्रैल-मई 2019 में 7 अरब, 48 करोड़, 28 लाख, 88 हजार रुपये सिर्फ भर्ते पर खर्च
  • अक्टूबर-नवंबर 2019 में 71 करोड़, 74 लाख, 30 हजार रुपये सिर्फ भर्ते पर खर्च
  • छह महीने में दरबार मूव समय और धन दोनों की बर्बादी, यह न्यायसंगत नहीं- कोर्ट

विज्ञापन
darbar move system cost paid by governmet shifting of offices of administration from Jammu to Srinagar
दरबार मूव व्यवस्था - फोटो : अमर उजाला, फाइल

विस्तार

दरबार मूवः यह व्यवस्था 1872 में डोगरा शासनकाल में शुरू हुई हुई थी। तत्कालीन महाराजा रणवीर सिंह ने राज्य की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह परंपरा शुरू की थी। इसके तहत छह-छह महीने जम्मू व श्रीनगर में दरबार रहता है। दरबार मूव पर सालाना 600 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

विज्ञापन


वहीं अब चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस रजनीश ओसवाल की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार तय करे कि दरबार मूव की आवश्यकता है या नहीं। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय को केंद्रीय गृह सचिव और प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इसकी समीक्षा हो और इस पर कोई निर्णय लिया जा सके।
विज्ञापन


अदालत ने कहा कि हर छह महीने में दरबार मूव करना समय और धन दोनों की बर्बादी है और यह न्यायसंगत नहीं है। हर छह महीने में दरबार मूव करना संसाधनों को जाया करने जैसा है। कोर्ट ने कहा कि हम अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के प्रति सजग हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


दरबार मूव समय और ऊर्जा की बर्बादी है। यह अक्षमता और गर्वनेंस का अभाव भी है। यह सप्ताह भर तक इस अनुत्पादक काम में लगे कर्मचारियों के वेतन भुगतान के रूप में भारी वित्तीय बोझ भी है। यह परंपरा लोगों के व्यापक हितों के विपरीत है।

केंद्र सरकार तय करे कि दरबार मूव की आवश्यकता है या नहीं

चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस रजनीश ओसवाल की खंडपीठ ने जनहित याचिका का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केंद्र सरकार तय करे कि दरबार मूव की आवश्यकता है या नहीं। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय को केंद्रीय गृह सचिव और प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि इसकी समीक्षा हो और इस पर कोई निर्णय लिया जा सके।

दरबार मूव से हर छह महीने में 200 करोड़ रुपये का खर्च होता है। हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए 93 पन्नों में फैसला लिखा है। खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट मोनिका कोहली के सुझावों को भी अपने फैसले में सूचीबद्ध किया है, जिसमें उन्होंने आधिकारिक दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप देने का उल्लेख किया है।

अदालत ने कहा कि दरबार स्थानांतरण का मूल और क्रियान्वयन जनहित की अवहेलना करता है। इसका प्रतिकूल प्रभाव विशाल राजकोषीय, सामाजिक और आर्थिक लागतों से संबंधित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है। अदालत ने कहा कि जो तथ्य पेश किए गए, उससे लगता है कि प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक उपलब्धि के बाद भी बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव नहीं किया गया।

हमारा न्यायिक विवेक हमें सतर्क करने के लिए विवश करता है अन्यथा हम अपने न्यायिक कर्तव्य या सांविधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने में विफल हो जाएंगे जो राष्ट्र और जम्मू-कश्मीर खासतौर पर आम महिलाओं और पुरुषों, गरीबों के प्रति है।

हाईकोर्ट ने फैसले में पहला सवाल यह उठाया कि क्या कोई सरकार अपनी राजधानी बदलने के लिए हर छह महीने में 200 करोड़ खर्च करने की क्षमता रखती है। क्या यह एक ऐसे प्रदेश के लिए स्वीकार्य है, जहां के लोग वित्तीय समस्या से जूझ रहे हों।

कोर्ट ने यह भी कहा

  • दरबार मूव के अलावा अन्य विकल्प तलाशे जाएं। सूचना प्रौद्योगिकी के युग में दो यूनिटों को एक यूनिट में बनाया जा सकता है। यदि सचिवालय और विभाग अलग-अलग स्थान पर हों तो भी कम से कम मानव संसाधन के मूवमेंट के बगैर वर्चुअली एक सचिवालय के रूप में बनाया जा सकता है।
  • जम्मू और श्रीनगर दोनों को साल भर बिना किसी बाधा के सक्षम प्रशासन और गर्वनेंस की जरूरत है। यह अनुचित और जनहित के खिलाफ है कि छह महीने तक कोई भी संभाग प्रशासनिक मशीनरी से बिल्कुल कटा रहे।
  • तकनीकी के युग में और तमाम इलेक्ट्रानिक संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी भौतिक रूप से संसाधनों की आवाजाही की जरूरत नहीं।
  • हजारों कर्मचारियों को छह महीने के लिए परिवार से अलग रहने को बाध्य किया जाता है। इससे उन पर शारीरिक और भावनात्मक दबाव होता है। यह दबाव कर्मचारियों पर ही नहीं बल्कि पत्नी, बच्चे और आश्रितों पर भी पड़ता है। यह उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे सौंपे गए कामों के प्रति दरबाव मूव कर्मचारियों की रुचि भी कम रहती है।
  • दरबार मूव से पुलिस, सुरक्षाबलों पर भारी दबाव पड़ता है। सरकारी खर्च भी बढ़ता है जो जनहित में नहीं है।
  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अच्छे पर्यावरण का जम्मू-कश्मीर के लोगों को अधिकार है। केंद्र शासित प्रदेश अपने नागरिकों को इन बुनियादी सुविधाएं देने से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय संबंधित सुविधाएं भी नहीं मिल पा रहीं। राज्य के वित्तीय संसाधनों को गैर जरूरी प्रयोग के लिए डायवर्ट नहीं किया जा सकता।
  • दरबार मूव के दौरान चार दिन तक राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों का प्रतिबंध जनहित पर बुरा असर डालता है।
  • सीमित संसाधनों वाले केंद्र शासित प्रदेश में दरबार मूव पर होने वाला खर्च अतिरिक्त बोझ डालता है। यह सरकारी खजाने के साथ ही टैक्स का भुगतान करने वालों पर बोझ है।
  • इस पर होने वाला खर्च सार्वजनिक संसाधनों का दुरुपयोग है जिसकी जनहित के लिए तत्काल जरूरत है। कोविड को देखते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं और स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने में इस राशि का उपयोग किए जाने की तत्काल जरूरत है।
  • दरबार मूव के साथ न्यायपालिका के शिफ्ट होने का कोई आधार या कारण नहीं है। इस वजह से न्याय मिलने में देर होती है क्योंकि छह महीने तक एक संभाग में रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो पाता है।
  • जनहित और प्रभावी गर्वनेंस के लिए यह जरूरी है कि कर्मचारियों तथा संसाधनों के मूवमेंट को कम किया जाए। दरबार मूव का रेशनलाइजेशन तत्काल जरूरी है।
  • परंपरा को रेशनलाइज किए जाने से इससे बचने वाली राशि का उपयोग केंद्र शासित प्रदेश के विकास तथा कल्याण में किया जा सकता है जिसने काफी मुश्किलों का सामना किया है। कोविड से जंग में खाद्यान्न की कमी, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सुविधाओं पर इसे खर्च किया जा सकता है।

सरकारी खजाने पर इतना बोझ तो केवल भत्ते के रूप में पड़ता है

प्रत्येक दरबार मूव में शामिल सभी कर्मचारियों को 25,000 रुपये भत्ते के रूप में दिया जाता है। इस हिसाब से साल में दो बार होने वाले दरबार मूव में प्रत्येक कर्मचारी को 50 हजार रुपये केवल भत्ता देना पड़ता है। इसके अलावा, 2,000 रुपये प्रति माह का एक अस्थायी भत्ता (टीएमए) भी दिया जाता है जोकि साल भर का 24,000 रुपये होता है।

इस तरह से हर कर्मचारी को प्रति वर्ष 74,000 रुपये का भुगतान किया जाता है। पिछले साल, अप्रैल-मई में गर्मियों में हुए दरबार मूव में 10,112 कर्मचारी शामिल थे। जबकि अक्टूबर-नवंबर में 9,695 लोग शामिल हुए थे। इस हिसाब से 7 अरब, 48 करोड़, 28 लाख, 88 हजार रुपये अप्रैल-मई में हुए दरबार मूव में और 71 करोड़, 74 लाख, 30 हजार रुपये अक्टूबर-नवंबर में हुए दरबार में केवल भत्ते के रूप में सरकारी कोष से कर्मचारियों को दिए गए।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed