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सूर्य ग्रहण पर लोगों ने की पूजा अर्चना, यज्ञ भी किया
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सांबा। सूर्य ग्रहण के समय लोगों ने कीर्तन किया। इसको लेकर मंदिरों में रौनक बनी रही। बाद में लोगों ने यज्ञ किए। गर्भवती महिलाओं को घरों से बाहर नहीं निकलने दिया गया। पंडित खेमराज शास्त्री के अनुसार हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है। उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं।
उन्होंने बताया कि खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इन दो ग्रहों की सूर्य और चंद्र से दुश्मनी बताई जाती है। यही वजह है कि ग्रहण काल में कोई भी कार्य करने की सलाह नहीं दी जाती है। दंत कथाओं के अनुसार जब दैत्यों ने तीनों लोक पर अपना अधिकार जमा लिया, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी। तीनों लोक को असुरों से बचाने के लिए भगवान विष्णु का आह्वान किया गया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को क्षीर सागर का मंथन करने के लिए कहा और इस मंथन से निकले अमृत का पान करने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने देवताओं को चेताया था कि ध्यान रहे अमृत असुर न पीने पाएं क्योंकि तब इन्हें युद्ध में कभी हराया नहीं जा सकेगा।
भगवान के कहे अनुसार देवताओं ने क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवता और असुरों में लड़ाई हुई। तब भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर एक तरफ देवता और एक तरफ असुरों को बिठा दिया और कहा कि बारी-बारी सबको अमृत मिलेगा। यह सुनकर एक असुर देवताओं के बीच वेश बदल कर बैठ गया, लेकिन चंद्र और सूर्य उसे पहचान गए और भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी, लेकिन तब तक भगवान उसे अमृत दे चुके थे। अमृत गले तक पहुंचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से असुर के धड़ को सिर से अलग कर दिया, लेकिन तब तक उसने अमृतपान कर लिया था। हालांकि, अमृत गले से नीच नहीं उतरा था, लेकिन उसका सिर अमर हो गया। सिर राहु बना और धड़ केतु के रूप में अमर हो गया। भेद खोलने के कारण ही राहु और केतु की चंद्र और सूर्य से दुश्मनी हो गई। कालांतर में राहु और केतु को चंद्रमा और पृथ्वी की छाया के नीचे स्थान प्राप्त हुआ है। उस समय से राहु, सूर्य और चंद्र से द्वेष की भावना रखते हैं, जिससे ग्रहण पड़ता है।
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सूर्य ग्रहण पर परिवार की सुख शांति के लिए प्रार्थना की
अखनूर। साल के अंतिम सूर्य ग्रहण को लेकर के लोगों को उत्सुक रही। मंगलवार शाम को सूर्य ग्रहण लगने पर पहले मंदिर के कपाट बंद किए गए। पूजा अर्चना और सत्संग किया गया। बड़ी संख्या में लोगों ने चंद्रा भागा नदी में स्नान करके पूजा अर्चना की। बाजारों में लोगों की आवाजाही कम रही। लोगों का कहना है कि साल के अंतिम सूर्य ग्रहण को लेकर पूजा अर्चना की गई, परिवार के सदस्यों के लिए सुख शांति के लिए प्रार्थना की। संवाद
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उन्होंने बताया कि खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इन दो ग्रहों की सूर्य और चंद्र से दुश्मनी बताई जाती है। यही वजह है कि ग्रहण काल में कोई भी कार्य करने की सलाह नहीं दी जाती है। दंत कथाओं के अनुसार जब दैत्यों ने तीनों लोक पर अपना अधिकार जमा लिया, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी। तीनों लोक को असुरों से बचाने के लिए भगवान विष्णु का आह्वान किया गया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को क्षीर सागर का मंथन करने के लिए कहा और इस मंथन से निकले अमृत का पान करने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने देवताओं को चेताया था कि ध्यान रहे अमृत असुर न पीने पाएं क्योंकि तब इन्हें युद्ध में कभी हराया नहीं जा सकेगा।
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भगवान के कहे अनुसार देवताओं ने क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवता और असुरों में लड़ाई हुई। तब भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर एक तरफ देवता और एक तरफ असुरों को बिठा दिया और कहा कि बारी-बारी सबको अमृत मिलेगा। यह सुनकर एक असुर देवताओं के बीच वेश बदल कर बैठ गया, लेकिन चंद्र और सूर्य उसे पहचान गए और भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी, लेकिन तब तक भगवान उसे अमृत दे चुके थे। अमृत गले तक पहुंचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से असुर के धड़ को सिर से अलग कर दिया, लेकिन तब तक उसने अमृतपान कर लिया था। हालांकि, अमृत गले से नीच नहीं उतरा था, लेकिन उसका सिर अमर हो गया। सिर राहु बना और धड़ केतु के रूप में अमर हो गया। भेद खोलने के कारण ही राहु और केतु की चंद्र और सूर्य से दुश्मनी हो गई। कालांतर में राहु और केतु को चंद्रमा और पृथ्वी की छाया के नीचे स्थान प्राप्त हुआ है। उस समय से राहु, सूर्य और चंद्र से द्वेष की भावना रखते हैं, जिससे ग्रहण पड़ता है।
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सूर्य ग्रहण पर परिवार की सुख शांति के लिए प्रार्थना की
अखनूर। साल के अंतिम सूर्य ग्रहण को लेकर के लोगों को उत्सुक रही। मंगलवार शाम को सूर्य ग्रहण लगने पर पहले मंदिर के कपाट बंद किए गए। पूजा अर्चना और सत्संग किया गया। बड़ी संख्या में लोगों ने चंद्रा भागा नदी में स्नान करके पूजा अर्चना की। बाजारों में लोगों की आवाजाही कम रही। लोगों का कहना है कि साल के अंतिम सूर्य ग्रहण को लेकर पूजा अर्चना की गई, परिवार के सदस्यों के लिए सुख शांति के लिए प्रार्थना की। संवाद