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Jammu News: डुग्गर मेले में कलकत्तेयां चलिए आई कालका... पर झूमे दर्शक
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कारक, पाख और रुट राड़े ने युवाओं को किया आकर्षित, झलकी डोगरी संस्कृति
संवाद न्यूज़ एजेंसी
जम्मू। डुग्गर मेले में विद्यार्थियों के समूह की डोगरी कारक कलकत्तेयां चलिए आई कालका... की प्रस्तुति से दर्शक झूम उठे। बैसाखी के उपलक्ष्य में डोगरा सदर सभा ने सोमवार को सभा परिसर में एक दिवसीय मेले का आयोजन किया। इसमें डोगरा विरासत, संस्कृति, खानपान, पहनावे और परंपराओं की आकर्षक झलकियां देखने को मिलीं। मेले का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को डोगरी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों से जोड़ना था। डोगरी संगीत कारक, पाख और रुट राड़े ने युवाओं को आकर्षित किया।
सांसद गुलाम अली खटाना और विधायक युद्धवीर सेठी मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर मेले का शुभारंभ किया। स्टालों का निरीक्षण किया। इसके बाद कला अकादमी और डोगरा सदर सभा के सहयोग से सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाए गए। स्थानीय कलाकारों, छात्रों और लोक गायकों ने डोगरी लोकगीतों की प्रस्तुतियां देकर माहौल को सांस्कृतिक रंग में रंग दिया।
मेले का सबसे विशेष आकर्षण ग्रामीण क्षेत्रों से आई महिलाओं की प्रस्तुतियां रहीं जिन्होंने डोगरी परंपरा, रीति-रिवाज और ग्रामीण जीवन की झलक पेश की। महिलाओं ने आंगन में रुट राड़े परंपरा की झलक पेश की। इसमें घर की महिलाएं विशेष अवसरों पर जमीन की लिपाई-पुताई कर चूने और रंगों से सुंदर चित्र बनाती हैं।
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निशा देवी, नीलम, पूनम और राजकुमारी ने मेले में डोगरी रहन-सहन की झांकी प्रस्तुत की। इसमें चूल्हा, चरखा, हुक्का और पुराने समय के घरेलू साजो-सामान रखे गए थे। महिलाएं डोगरी गीत गाते हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। युवाओं ने इन झांकियों में विशेष रुचि दिखाई और मोबाइल में तस्वीरें व वीडियो भी बनाए।
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बिन्नआ, कलीरे, पंखी, छज्जे ने खींचा ध्यान
सभा परिसर में डुग्गर संस्कृति से जुड़े विभिन्न उत्पादों के स्टाल लगाए गए। इनमें बिन्नआ, कलीरे, पंखी, छज्जे और अन्य पारंपरिक वस्तुओं ने लोगों को आकर्षित किया। डोगरी हस्तशिल्प, फुलकारी, गोटा कार्य और पारंपरिक वस्त्रों के स्टालों पर भी अच्छी भीड़ रही। मेले में डोगरी व्यंजन दाल, चावल, अम्बल, क्यूर और अन्य पारंपरिक पकवानों का लोगों ने भरपूर आनंद लिया। डोगरा सदर सभा के अध्यक्ष गंभीर सिंह चाढ़क ने कहा कि डुग्गर मेले का उद्देश्य हर आयु वर्ग को अपनी संस्कृति से जोड़ना है।
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शहरीकरण से लुप्त हो रहीं डोरी परंपराएं
बाबा तालाब से आई राजरानी व वीना देवी का कहना है कि आज भी गांवों में सावन, बैसाखी और अन्य त्योहारों पर रुट राड़े बनाए जाते हैं। पाख जैसे डोगरी गीत भी गाए जाते हैं लेकिन शहरों तक आते-आते ये परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। उन्होंने कहा ऐसे मेलों से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति जानने और समझने का अच्छा अवसर मिलता है। डोगरी उत्पादों का स्टाल लगाने वाली मथवार की रजनी का कहना है कि उनका समूह शादियों में इस्तेमाल होने वाले कलीरे, छज्जे, आसन आदि का हाथों में निर्माण करता है।
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संवाद न्यूज़ एजेंसी
जम्मू। डुग्गर मेले में विद्यार्थियों के समूह की डोगरी कारक कलकत्तेयां चलिए आई कालका... की प्रस्तुति से दर्शक झूम उठे। बैसाखी के उपलक्ष्य में डोगरा सदर सभा ने सोमवार को सभा परिसर में एक दिवसीय मेले का आयोजन किया। इसमें डोगरा विरासत, संस्कृति, खानपान, पहनावे और परंपराओं की आकर्षक झलकियां देखने को मिलीं। मेले का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को डोगरी भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों से जोड़ना था। डोगरी संगीत कारक, पाख और रुट राड़े ने युवाओं को आकर्षित किया।
सांसद गुलाम अली खटाना और विधायक युद्धवीर सेठी मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित कर मेले का शुभारंभ किया। स्टालों का निरीक्षण किया। इसके बाद कला अकादमी और डोगरा सदर सभा के सहयोग से सांस्कृतिक कार्यक्रम करवाए गए। स्थानीय कलाकारों, छात्रों और लोक गायकों ने डोगरी लोकगीतों की प्रस्तुतियां देकर माहौल को सांस्कृतिक रंग में रंग दिया।
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मेले का सबसे विशेष आकर्षण ग्रामीण क्षेत्रों से आई महिलाओं की प्रस्तुतियां रहीं जिन्होंने डोगरी परंपरा, रीति-रिवाज और ग्रामीण जीवन की झलक पेश की। महिलाओं ने आंगन में रुट राड़े परंपरा की झलक पेश की। इसमें घर की महिलाएं विशेष अवसरों पर जमीन की लिपाई-पुताई कर चूने और रंगों से सुंदर चित्र बनाती हैं।
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निशा देवी, नीलम, पूनम और राजकुमारी ने मेले में डोगरी रहन-सहन की झांकी प्रस्तुत की। इसमें चूल्हा, चरखा, हुक्का और पुराने समय के घरेलू साजो-सामान रखे गए थे। महिलाएं डोगरी गीत गाते हुए लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। युवाओं ने इन झांकियों में विशेष रुचि दिखाई और मोबाइल में तस्वीरें व वीडियो भी बनाए।
बिन्नआ, कलीरे, पंखी, छज्जे ने खींचा ध्यान
सभा परिसर में डुग्गर संस्कृति से जुड़े विभिन्न उत्पादों के स्टाल लगाए गए। इनमें बिन्नआ, कलीरे, पंखी, छज्जे और अन्य पारंपरिक वस्तुओं ने लोगों को आकर्षित किया। डोगरी हस्तशिल्प, फुलकारी, गोटा कार्य और पारंपरिक वस्त्रों के स्टालों पर भी अच्छी भीड़ रही। मेले में डोगरी व्यंजन दाल, चावल, अम्बल, क्यूर और अन्य पारंपरिक पकवानों का लोगों ने भरपूर आनंद लिया। डोगरा सदर सभा के अध्यक्ष गंभीर सिंह चाढ़क ने कहा कि डुग्गर मेले का उद्देश्य हर आयु वर्ग को अपनी संस्कृति से जोड़ना है।
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शहरीकरण से लुप्त हो रहीं डोरी परंपराएं
बाबा तालाब से आई राजरानी व वीना देवी का कहना है कि आज भी गांवों में सावन, बैसाखी और अन्य त्योहारों पर रुट राड़े बनाए जाते हैं। पाख जैसे डोगरी गीत भी गाए जाते हैं लेकिन शहरों तक आते-आते ये परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। उन्होंने कहा ऐसे मेलों से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति जानने और समझने का अच्छा अवसर मिलता है। डोगरी उत्पादों का स्टाल लगाने वाली मथवार की रजनी का कहना है कि उनका समूह शादियों में इस्तेमाल होने वाले कलीरे, छज्जे, आसन आदि का हाथों में निर्माण करता है।