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पुलिस से काफी स्ट्रांग है अकाउंट हैकरों को नेटवर्क
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बाड़ी ब्राह्मण/जम्मू। उपभोक्ता के मोबाइल पर फोन करके बैंक अकाउंट से ठगी करने वाले हैकरों के नेटवर्क के आगे पुलिस का नेटवर्क बौना साबित हो रहा है। पुलिस ने साइबर अपराध की रोकथाम और धरपकड़ के लिए साइबर सेल का गठन तो किया है लेकिन उसका सूचना तंत्र काफी कमजोर हैं। दूसरी तरफ पुलिस पीड़ित को बैंक, थाने और साइबर में दौड़ा कर उलझा देती है और हैकर खाते से निकाले गए रुपयों को सैकड़ों स्थानों पर बांट चुके हैं।
बैंक खाते से होने वाली ऑनलाइन ठगी को रोकने और हैकरों की धरपकड़ करने में पुलिस का तंत्र काफी कमजोर हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि पुलिस की तरफ से यह जागरूकता जरूर फैलाई जा रही है कि ऑनलाइन होने वाली ठगी होने पर 24 घंटे के अंदर शिकायत दर्ज की जाए तो ठगी किए एक पैसों को पकड़ा जा सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पुलिस इस मामले में पीड़ित को इस प्रकार से उलझा देती है कि उपभोक्ता थाने, बैंक और साइबर सेल का ही चक्कर काटता रह जाता है और हैकर उसके ठगे हुए पैसों को ठिकाने लगा चुके होते हैं। बैंक से ऑनलाइन की गई ठगी के मामले में बैंक की तरफ से कहा जाता है कि पहले इसकी थाने में एफआईआर दर्ज कराई जाए। पीड़ित संबंधित क्षेत्र के थाने में जाता है कि वहां सेे उसे साइबर सेल में भेज दिया जाता है कि यह मामला साइबर सेल का है। उधर साइबर सेल में पहुंचने पर पीड़ित से संबंधित थाने की रिपोर्ट, बैंक की स्टेटमेंट मांगी जाती है। जब तक यह सभी उपभोक्ता एकत्रित करता है तब तक 24 घंटे से अधिक समय बीत जाता है। दूसरी तरफ हैकर उन पैसों को कई खातों में स्थानांतरित कर चुका होता है। उदाहरण के तौर पर अगर उपभोक्ता के खाते से एक लाख रुपये भी निकले हैं तो हैकर उसे 50 खातों में बांट चुका होता है। इस स्थिति में पुलिस बेबस और लाचार दिखाई देती है। पुलिस का कहना है कि इस प्रकार की स्थिति में साइबर सेल की कार्रवाई शून्य हो जाती है। यह केस फिर से संबंधित थाने को स्थानांतरित किया जाता है और वह हैकर का पता लगाकर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करेगी और उसकी धरपकड़ करेगी।
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जागरूकता ही बचाव
हैकरों का नेटवर्क इतना जबरदस्त है कि कस्टमर केयर पर हुई कॉल को भी वे हैक कर लेते हैं और पहला फोन काटकर अपने फोन से उसी समस्या के संबंध में बात करते हैं जिस समस्या के समाधान के लिए कस्टमर केयर में फोन किया गया है। पुलिस का कहना है कि उपभोक्ताओं को इतनी जागरूकता रखनी है कि अगर बैंक से संबंध कोई हेरफेर हुई है तो सीधे ब्रांच में संपर्क किया जाए। फोन पर अगर किसी प्रकार के पैसे लौटाने की बात की जाती है और एकाउंट से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है तो वह फर्जी है।
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बैंक से की गई धोखाधड़ी में अगर सेल को चार घंटे में जानकारी मुहैया कराई जाती है तो निकाले गए शत प्रतिशत पैसे पकड़े जा सकते हैं। 12 घंटे के बाद उसकी संभावना 50 प्रतिशत रह जाती है और 24 घंटे बाद वह शून्य में चली जाती है। ऑनलाइन ठगी करने वाले अधिकतर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ प्रदेश के लोग हैं। कई केस की जांच में यह पाया गया है कि जो सिम इस्तेमाल की गई है वह आसाम, बंगाल या अन्य स्टेट के पते पर जारी हुई है और चल कहीं और है। फिर भी पुलिस पूरी कार्रवाई अमल में लाती है।
-परोपकार सिंह, डीएसपी, साइबर सेल, जम्मू
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बैंक खाते से होने वाली ऑनलाइन ठगी को रोकने और हैकरों की धरपकड़ करने में पुलिस का तंत्र काफी कमजोर हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि पुलिस की तरफ से यह जागरूकता जरूर फैलाई जा रही है कि ऑनलाइन होने वाली ठगी होने पर 24 घंटे के अंदर शिकायत दर्ज की जाए तो ठगी किए एक पैसों को पकड़ा जा सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि पुलिस इस मामले में पीड़ित को इस प्रकार से उलझा देती है कि उपभोक्ता थाने, बैंक और साइबर सेल का ही चक्कर काटता रह जाता है और हैकर उसके ठगे हुए पैसों को ठिकाने लगा चुके होते हैं। बैंक से ऑनलाइन की गई ठगी के मामले में बैंक की तरफ से कहा जाता है कि पहले इसकी थाने में एफआईआर दर्ज कराई जाए। पीड़ित संबंधित क्षेत्र के थाने में जाता है कि वहां सेे उसे साइबर सेल में भेज दिया जाता है कि यह मामला साइबर सेल का है। उधर साइबर सेल में पहुंचने पर पीड़ित से संबंधित थाने की रिपोर्ट, बैंक की स्टेटमेंट मांगी जाती है। जब तक यह सभी उपभोक्ता एकत्रित करता है तब तक 24 घंटे से अधिक समय बीत जाता है। दूसरी तरफ हैकर उन पैसों को कई खातों में स्थानांतरित कर चुका होता है। उदाहरण के तौर पर अगर उपभोक्ता के खाते से एक लाख रुपये भी निकले हैं तो हैकर उसे 50 खातों में बांट चुका होता है। इस स्थिति में पुलिस बेबस और लाचार दिखाई देती है। पुलिस का कहना है कि इस प्रकार की स्थिति में साइबर सेल की कार्रवाई शून्य हो जाती है। यह केस फिर से संबंधित थाने को स्थानांतरित किया जाता है और वह हैकर का पता लगाकर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करेगी और उसकी धरपकड़ करेगी।
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जागरूकता ही बचाव
हैकरों का नेटवर्क इतना जबरदस्त है कि कस्टमर केयर पर हुई कॉल को भी वे हैक कर लेते हैं और पहला फोन काटकर अपने फोन से उसी समस्या के संबंध में बात करते हैं जिस समस्या के समाधान के लिए कस्टमर केयर में फोन किया गया है। पुलिस का कहना है कि उपभोक्ताओं को इतनी जागरूकता रखनी है कि अगर बैंक से संबंध कोई हेरफेर हुई है तो सीधे ब्रांच में संपर्क किया जाए। फोन पर अगर किसी प्रकार के पैसे लौटाने की बात की जाती है और एकाउंट से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है तो वह फर्जी है।
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बैंक से की गई धोखाधड़ी में अगर सेल को चार घंटे में जानकारी मुहैया कराई जाती है तो निकाले गए शत प्रतिशत पैसे पकड़े जा सकते हैं। 12 घंटे के बाद उसकी संभावना 50 प्रतिशत रह जाती है और 24 घंटे बाद वह शून्य में चली जाती है। ऑनलाइन ठगी करने वाले अधिकतर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ प्रदेश के लोग हैं। कई केस की जांच में यह पाया गया है कि जो सिम इस्तेमाल की गई है वह आसाम, बंगाल या अन्य स्टेट के पते पर जारी हुई है और चल कहीं और है। फिर भी पुलिस पूरी कार्रवाई अमल में लाती है।
-परोपकार सिंह, डीएसपी, साइबर सेल, जम्मू