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Jammu News: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दी ट्रायल कोर्ट के आदेश में बदलाव को अर्जी की स्वतंत्रता
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समय पर आपत्ति दाखिल न करने पर निचली अदालत ने कर दिया था अधिकार खत्म
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के आदेश में बदलाव की अर्जी की स्वतंत्रता दी है। यह फैसला बीती तीन जुलाई को रिजर्व किया गया था। इसे बीते शुक्रवार को सुनाया गया।
राजिंदर कुमार बनाम सुमन कुमारी मामले में याचिकाकर्ता ने प्रधान जिला जज सांबा की ओर से 23 अगस्त, 2024 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। इसके तहत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत प्रतिवादी के आवेदन पर आपत्ति दाखिल करने का याचिकाकर्ता का अधिकार खत्म हो गया था। उसे हर महीने पांच हजार का गुजारा भत्ता और सुनवाई खर्च के लिए 10 हजार रुपये देने के निर्देश दिए गए थे।
याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत निचली अदालत में तलाक के लिए याचिका दायर की थी। निस्तारण लंबित रहने तक प्रतिवादी पत्नी ने सात नवंबर, 2023 को भत्ते और सुनवाई खर्च की याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता समय पर अपनी आपत्ति दाखिल नहीं कर सका, जिसकी वजह से निचली अदालत ने विवादित आदेश के जरिये उसके इस अधिकार को खत्म कर दिया।
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इस पर अदालत ने प्रतिवादी को नोटिस दिया। रजिस्ट्री की रिपोर्ट के अनुसार, उसने नोटिस लेने से मना कर दिया है। इसलिए उसे एकतरफा सजा दी जाएगी। हाईकोर्ट के जज रजनेश ओसवाल ने याचिकाकर्ता को 23 अगस्त, 2024 के आदेश में बदलाव के लिए प्रधान जिला जज, सांबा से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। कहा कि अगर ऐसी कोई अर्जी दी जाती है तो कोर्ट के 15 मार्च, 2024 के आदेश के जरिये दिए गए समानांतर मेंटिनेंस के असर पर विचार किया जाएगा। उस पर कोर्ट कानून के हिसाब से उचित आदेश देगी। यह भी कहा कि फैसले का केस की मेरिट पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
प्रतिवादी के एकतरफा दावे माने गए, कई केस थे
बताया गया कि आदेश के तहत अदालत ने प्रतिवादी के एकतरफा दावों को मानते हुए गुजारा भत्ते की रकम तय करने की प्रक्रिया शुरू की कि याचिकाकर्ता एक सफल व्यवसायी है। उसके पास कई अचल संपत्तियां हैं और वह हर महीने 80 हजार से ज्यादा कमाता है। बताया गया कि प्रतिवादी ने कई बार केस किया। सांबा के एडिशनल स्पेशल मोबाइल मजिस्ट्रेट के सामने शुरू की गई कार्रवाई में प्रतिवादी और नाबालिग को 15 मार्च, 2024 के आदेश के जरिये हर महीने तीन हजार का अंतरिम गुजारा भत्ता दिया गया। इसके बाद प्रतिवादी ने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने एक याचिका दायर की। इसमें 13 अगस्त, 2024 के आदेश के जरिये प्रतिवादी को हर महीने चार हजार रुपये अतिरिक्त अंतरिम गुजारा भत्ता दिया गया।
याचिकाकर्ता के वकील की यह थी दलील
आखिरकार याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के 23 अगस्त, 2024 के आदेश के खिलाफ याचिका की। उसके वकील ने अपनी दलील में कहा कि जिस आदेश पर सवाल उठाया गया है, वह पहली नजर में मनमाना और गैर-कानूनी है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन है। याचिकाकर्ता को सुनवाई का सही और असरदार मौका दिए बिना उसके आपत्ति दाखिल करने के अधिकार को खत्म किया गया। यह भी कहा कि प्रतिवादी के उन आरोपों को भी मान लिया गया, जिसमें याचिकाकर्ता की आय और अचल संपत्ति के मालिकाना हक के बारे में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था। वह सिर्फ एक छोटी सी किराने की दुकान चलाता है, जिससे उसे हर महीने लगभग 10 हजार रुपये की मामूली आय है।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के आदेश में बदलाव की अर्जी की स्वतंत्रता दी है। यह फैसला बीती तीन जुलाई को रिजर्व किया गया था। इसे बीते शुक्रवार को सुनाया गया।
राजिंदर कुमार बनाम सुमन कुमारी मामले में याचिकाकर्ता ने प्रधान जिला जज सांबा की ओर से 23 अगस्त, 2024 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। इसके तहत हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत प्रतिवादी के आवेदन पर आपत्ति दाखिल करने का याचिकाकर्ता का अधिकार खत्म हो गया था। उसे हर महीने पांच हजार का गुजारा भत्ता और सुनवाई खर्च के लिए 10 हजार रुपये देने के निर्देश दिए गए थे।
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याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत निचली अदालत में तलाक के लिए याचिका दायर की थी। निस्तारण लंबित रहने तक प्रतिवादी पत्नी ने सात नवंबर, 2023 को भत्ते और सुनवाई खर्च की याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ता समय पर अपनी आपत्ति दाखिल नहीं कर सका, जिसकी वजह से निचली अदालत ने विवादित आदेश के जरिये उसके इस अधिकार को खत्म कर दिया।
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इस पर अदालत ने प्रतिवादी को नोटिस दिया। रजिस्ट्री की रिपोर्ट के अनुसार, उसने नोटिस लेने से मना कर दिया है। इसलिए उसे एकतरफा सजा दी जाएगी। हाईकोर्ट के जज रजनेश ओसवाल ने याचिकाकर्ता को 23 अगस्त, 2024 के आदेश में बदलाव के लिए प्रधान जिला जज, सांबा से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। कहा कि अगर ऐसी कोई अर्जी दी जाती है तो कोर्ट के 15 मार्च, 2024 के आदेश के जरिये दिए गए समानांतर मेंटिनेंस के असर पर विचार किया जाएगा। उस पर कोर्ट कानून के हिसाब से उचित आदेश देगी। यह भी कहा कि फैसले का केस की मेरिट पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
प्रतिवादी के एकतरफा दावे माने गए, कई केस थे
बताया गया कि आदेश के तहत अदालत ने प्रतिवादी के एकतरफा दावों को मानते हुए गुजारा भत्ते की रकम तय करने की प्रक्रिया शुरू की कि याचिकाकर्ता एक सफल व्यवसायी है। उसके पास कई अचल संपत्तियां हैं और वह हर महीने 80 हजार से ज्यादा कमाता है। बताया गया कि प्रतिवादी ने कई बार केस किया। सांबा के एडिशनल स्पेशल मोबाइल मजिस्ट्रेट के सामने शुरू की गई कार्रवाई में प्रतिवादी और नाबालिग को 15 मार्च, 2024 के आदेश के जरिये हर महीने तीन हजार का अंतरिम गुजारा भत्ता दिया गया। इसके बाद प्रतिवादी ने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने एक याचिका दायर की। इसमें 13 अगस्त, 2024 के आदेश के जरिये प्रतिवादी को हर महीने चार हजार रुपये अतिरिक्त अंतरिम गुजारा भत्ता दिया गया।
याचिकाकर्ता के वकील की यह थी दलील
आखिरकार याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के 23 अगस्त, 2024 के आदेश के खिलाफ याचिका की। उसके वकील ने अपनी दलील में कहा कि जिस आदेश पर सवाल उठाया गया है, वह पहली नजर में मनमाना और गैर-कानूनी है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन है। याचिकाकर्ता को सुनवाई का सही और असरदार मौका दिए बिना उसके आपत्ति दाखिल करने के अधिकार को खत्म किया गया। यह भी कहा कि प्रतिवादी के उन आरोपों को भी मान लिया गया, जिसमें याचिकाकर्ता की आय और अचल संपत्ति के मालिकाना हक के बारे में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था। वह सिर्फ एक छोटी सी किराने की दुकान चलाता है, जिससे उसे हर महीने लगभग 10 हजार रुपये की मामूली आय है।