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Jammu News: 25 साल पुराने शोपियां हिंसक झड़प मामले में 10 साल की सजा बरकरार, हत्या का आरोप खारिज
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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला, 2001 में जमीन विवाद से जुड़ा है मामला
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने शोपियां में जमीन विवाद से जुड़े एक 25 साल पुराने हिंसक झड़प के मामले में शकील अहमद हजाम को सुनाई 10 साल की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने राज्य की उस अपील को खारिज कर दिया।
चीफ जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। केस के अनुसार यह मामला 26 अगस्त, 2001 का है। शोपियां के पदपावन में संपत्ति के विवाद को लेकर दो गुटों के बीच झड़प हुई थी। कई लोग लाठी, कुल्हाड़ी और अन्य हथियारों के साथ शिकायतकर्ता के परिसर में घुस आए थे। गुल लोन के सिर पर चोट लगी और बाद में सौरा अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
पुलवामा के सेशंस जज ने आरोपियों को आरपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। हालांकि, शकील अहमद हजाम को आरपीसी की धारा 304 (2) और 447 के तहत दोषी ठहराया गया और 10 साल की साधारण कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। खुर्शीद अहमद हजाम को आरपीसी की धारा 325 और 447 के तहत दोषी ठहराया गया और पांच साल की सजा सुनाई गई। सबूतों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि झड़प में शकील ने गुल लोन के सिर पर कुल्हाड़ी के कुंदे (बिना धार वाला हिस्सा) से एक ही वार किया था। न तो उसके धारदार हिस्से का इस्तेमाल किया और न ही दोबारा वार किया। कोर्ट ने माना कि हथियार की प्रकृति, लगी एक ही चोट और हमले से पहले की स्थितियों से पता चलता है कि उसका जान लेने का कोई इरादा नहीं था। आरोपी को यह जानकारी तो थी ही कि सिर पर ऐसी चोट से मौत हो सकती है।
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बेंच ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि सरकारी गवाहों के बयानों को सिर्फ इसलिए नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि वे मृतक के रिश्तेदार थे। कहा कि अगर रिश्तेदारों के बयानों की बारीकी से जांच करने पर वे सही पाए जाते हैं तो उन पर भरोसा किया जा सकता है। आरोपी के घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाने की कोशिशों के विरोध की दलील पर हाई कोर्ट ने कहा कि घटना के बाद के व्यवहार के आधार पर हत्या का इरादा साबित नहीं किया जा सकता। जेएनएफ
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने शोपियां में जमीन विवाद से जुड़े एक 25 साल पुराने हिंसक झड़प के मामले में शकील अहमद हजाम को सुनाई 10 साल की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने राज्य की उस अपील को खारिज कर दिया।
चीफ जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीव कुमार की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। केस के अनुसार यह मामला 26 अगस्त, 2001 का है। शोपियां के पदपावन में संपत्ति के विवाद को लेकर दो गुटों के बीच झड़प हुई थी। कई लोग लाठी, कुल्हाड़ी और अन्य हथियारों के साथ शिकायतकर्ता के परिसर में घुस आए थे। गुल लोन के सिर पर चोट लगी और बाद में सौरा अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
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पुलवामा के सेशंस जज ने आरोपियों को आरपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के आरोप से बरी कर दिया था। हालांकि, शकील अहमद हजाम को आरपीसी की धारा 304 (2) और 447 के तहत दोषी ठहराया गया और 10 साल की साधारण कैद और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। खुर्शीद अहमद हजाम को आरपीसी की धारा 325 और 447 के तहत दोषी ठहराया गया और पांच साल की सजा सुनाई गई। सबूतों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि झड़प में शकील ने गुल लोन के सिर पर कुल्हाड़ी के कुंदे (बिना धार वाला हिस्सा) से एक ही वार किया था। न तो उसके धारदार हिस्से का इस्तेमाल किया और न ही दोबारा वार किया। कोर्ट ने माना कि हथियार की प्रकृति, लगी एक ही चोट और हमले से पहले की स्थितियों से पता चलता है कि उसका जान लेने का कोई इरादा नहीं था। आरोपी को यह जानकारी तो थी ही कि सिर पर ऐसी चोट से मौत हो सकती है।
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बेंच ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि सरकारी गवाहों के बयानों को सिर्फ इसलिए नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि वे मृतक के रिश्तेदार थे। कहा कि अगर रिश्तेदारों के बयानों की बारीकी से जांच करने पर वे सही पाए जाते हैं तो उन पर भरोसा किया जा सकता है। आरोपी के घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाने की कोशिशों के विरोध की दलील पर हाई कोर्ट ने कहा कि घटना के बाद के व्यवहार के आधार पर हत्या का इरादा साबित नहीं किया जा सकता। जेएनएफ