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Jammu News: अदालतों में आपराधिक मामलों की सुनवाई का ढंग बदलेगा, जमानत पर 3 से 7 दिन में सुनवाई
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- हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच और सुनवाई की प्रक्रिया को लेकर जारी किए नए नियम
- घटनास्थल का नक्शा और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी अनिवार्य, 60 दिन में तय करने होंगे चार्ज
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू/श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच और सुनवाई को लेकर नए नियम जारी किए हैं। गैर-जमानती मामलों में जमानत की अर्जी पहली सुनवाई के बाद सामान्य तौर पर 3 से 7 दिन में निपटाई जाएगी। जमानत और अग्रिम जमानत के मामले भी दो सप्ताह से दो महीने में निपटाने होंगे। देरी होने पर अदालत को आदेश में वजह बतानी होगी। पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के जमानत मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी। जमानत की सुनवाई में पीड़ित को भी अपनी बात रखने का अधिकार होगा।
ये नियम सुप्रीम कोर्ट के पांच फरवरी 2026 के आदेश के पालन में जारी किए गए हैं और हाईकोर्ट के अधीन सभी निचली अदालतों पर लागू होंगे। मेडिको-लीगल, पोस्टमार्टम और पंचनामा रिपोर्ट के पीछे शरीर का आगे और पीछे का चित्र होगा, जिस पर चोटें चिन्हित की जाएंगी। पुलिस कार्रवाई या हिरासत में मौत के मामलों में पोस्टमार्टम की तस्वीर और वीडियो बनाकर सुरक्षित रखनी होगी। घटनास्थल के नक्शे में शव, हथियार, खून के निशान और गोली के खोखे जैसी जरूरी चीजें दर्ज करनी होंगी। जहां संभव हो, मौके की तस्वीर और वीडियो भी बनाई जाएगी।
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गवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग, उसी दिन मिलेगी प्रति
जहां संभव हो, गवाही टाइप करने के साथ वीडियो में भी रिकॉर्ड होगी। गवाह की भाषा में बयान दर्ज होगा और जरूरत पर अंग्रेजी में अनुवाद किया जाएगा। गवाही की प्रमाणित प्रति आरोपी, वकील, गवाह और सरकारी वकील को उसी दिन देने का प्रावधान है। आरोप पर पहली सुनवाई से 60 दिन में चार्ज तय करने का आदेश तैयार करना होगा। फैसले में मुद्दे, निर्णय और उसके कारण साफ दर्ज करने होंगे।
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- घटनास्थल का नक्शा और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी अनिवार्य, 60 दिन में तय करने होंगे चार्ज
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू/श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच और सुनवाई को लेकर नए नियम जारी किए हैं। गैर-जमानती मामलों में जमानत की अर्जी पहली सुनवाई के बाद सामान्य तौर पर 3 से 7 दिन में निपटाई जाएगी। जमानत और अग्रिम जमानत के मामले भी दो सप्ताह से दो महीने में निपटाने होंगे। देरी होने पर अदालत को आदेश में वजह बतानी होगी। पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के जमानत मामलों को प्राथमिकता दी जाएगी। जमानत की सुनवाई में पीड़ित को भी अपनी बात रखने का अधिकार होगा।
ये नियम सुप्रीम कोर्ट के पांच फरवरी 2026 के आदेश के पालन में जारी किए गए हैं और हाईकोर्ट के अधीन सभी निचली अदालतों पर लागू होंगे। मेडिको-लीगल, पोस्टमार्टम और पंचनामा रिपोर्ट के पीछे शरीर का आगे और पीछे का चित्र होगा, जिस पर चोटें चिन्हित की जाएंगी। पुलिस कार्रवाई या हिरासत में मौत के मामलों में पोस्टमार्टम की तस्वीर और वीडियो बनाकर सुरक्षित रखनी होगी। घटनास्थल के नक्शे में शव, हथियार, खून के निशान और गोली के खोखे जैसी जरूरी चीजें दर्ज करनी होंगी। जहां संभव हो, मौके की तस्वीर और वीडियो भी बनाई जाएगी।
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गवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग, उसी दिन मिलेगी प्रति
जहां संभव हो, गवाही टाइप करने के साथ वीडियो में भी रिकॉर्ड होगी। गवाह की भाषा में बयान दर्ज होगा और जरूरत पर अंग्रेजी में अनुवाद किया जाएगा। गवाही की प्रमाणित प्रति आरोपी, वकील, गवाह और सरकारी वकील को उसी दिन देने का प्रावधान है। आरोप पर पहली सुनवाई से 60 दिन में चार्ज तय करने का आदेश तैयार करना होगा। फैसले में मुद्दे, निर्णय और उसके कारण साफ दर्ज करने होंगे।
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