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जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश को मिली केंद्र से मंजूरी, 19 दिसंबर से होगा लागू
Tue, 18 Dec 2018 12:57 AM IST
Pranjal Dixit
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: Pranjal Dixit
Updated Tue, 18 Dec 2018 12:57 AM IST
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राज्यपाल सत्यपाल मलिक
- फोटो : फाइल
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केंद्र ने रियासत में 19 दिसंबर के बाद राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक की रिपोर्ट पर सोमवार देर शाम हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की। अब इसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मंजूरी देंगे। इससे पहले राज्यपाल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर राज्य में 19 दिसंबर को राज्यपाल शासन की अवधि छह महीने पूरे होने पर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की थी।
इस साल जून में भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई थी। इसके बाद कांग्रेस और नेकां के समर्थन से पीडीपी ने फिर से सरकार बनाने की कवायद की थी। इस बीच, सज्जाद लोन ने भी भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा किया था। इसके बाद राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 21 नवंबर को विधानसभा को भंग कर दिया था।
जम्मू-कश्मीर का पृथक संविधान होने के कारण अनुच्छेद 92 के तहत राज्य में छह माह का राज्यपाल शासन अनिवार्य है, जिसके बाद सभी विधायी शक्तियां राज्यपाल के पास आ जाती हैं। इसके बाद अगले छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। इस दौरान राज्य में चुनाव की घोषणा करनी होती है। अगर चुनाव की घोषणा नहीं की जाती है तो राष्ट्रपति शासन अगले छह माह के लिए बढ़ाया जा सकता है।
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राष्ट्रपति शासन तीन साल से अधिक नहीं प्रभावी रहेगा
राष्ट्रपति शासन किसी भी स्थिति में तीन साल से अधिक प्रभावी नहीं रहेगा। चुनाव आयोग का हस्तक्षेप अपवाद है। उसे इस बात का प्रमाणपत्र देना होगा कि विधानसभा चुनाव कराने में कठिनाइयों की वजह से राष्ट्रपति शासन का बना रहना आवश्यक है। राज्य संविधान अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन में नहीं आता है और राज्य के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत उसकी घोषणा की जाती है। ऐसे में उसके बाद लिए जाने वाले सभी निर्णयों पर अनुच्छेद 74 (1) के तहत राष्ट्रपति की मुहर लगनी अनिवार्य है। इस अनुच्छेद के तहत प्रधानमंत्री की अगुवाई में कैबिनेट राष्ट्रपति को सहयोग और सलाह देगी।
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इस साल जून में भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई थी। इसके बाद कांग्रेस और नेकां के समर्थन से पीडीपी ने फिर से सरकार बनाने की कवायद की थी। इस बीच, सज्जाद लोन ने भी भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा किया था। इसके बाद राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 21 नवंबर को विधानसभा को भंग कर दिया था।
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जम्मू-कश्मीर का पृथक संविधान होने के कारण अनुच्छेद 92 के तहत राज्य में छह माह का राज्यपाल शासन अनिवार्य है, जिसके बाद सभी विधायी शक्तियां राज्यपाल के पास आ जाती हैं। इसके बाद अगले छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। इस दौरान राज्य में चुनाव की घोषणा करनी होती है। अगर चुनाव की घोषणा नहीं की जाती है तो राष्ट्रपति शासन अगले छह माह के लिए बढ़ाया जा सकता है।
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राष्ट्रपति शासन तीन साल से अधिक नहीं प्रभावी रहेगा
राष्ट्रपति शासन किसी भी स्थिति में तीन साल से अधिक प्रभावी नहीं रहेगा। चुनाव आयोग का हस्तक्षेप अपवाद है। उसे इस बात का प्रमाणपत्र देना होगा कि विधानसभा चुनाव कराने में कठिनाइयों की वजह से राष्ट्रपति शासन का बना रहना आवश्यक है। राज्य संविधान अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन में नहीं आता है और राज्य के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत उसकी घोषणा की जाती है। ऐसे में उसके बाद लिए जाने वाले सभी निर्णयों पर अनुच्छेद 74 (1) के तहत राष्ट्रपति की मुहर लगनी अनिवार्य है। इस अनुच्छेद के तहत प्रधानमंत्री की अगुवाई में कैबिनेट राष्ट्रपति को सहयोग और सलाह देगी।
राज्यपाल ने इसलिए भंग कर दी थी विधानसभा
राज्यपाल ने कांग्रेस और उसकी धुर विरोधी नेशनल कांफ्रेंस के समर्थन से पीडीपी और सज्जाद लोन की पीपुल्स कांफ्रेंस की ओर से सरकार बनाने का दावा करने के बाद विधानसभा भंग कर दी थी। उन्होंने सरकार गठन के लिए खरीद-फ रोख्त और सरकार के स्थिर न होने का हवाला देते हुए विधानसभा भंग कर दी थी।