एलएसी पर भारत-चीन के सैन्य जमावड़े से लद्दाखी भी हैरान, बोले- ड्रैगन पर कसनी होगी नकेल
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गलवां घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के जमावड़े से इस बार लद्दाख के लोग भी हैरान हैं। लद्दाख के लोगों का कहना है कि चीन पहले भी जमीन हथियाने के लिए ऐसी गतिविधियों को अंजाम देता रहा है लेकिन गलवां घाटी में पहली बार एलएसी के दोनों ओर बड़ी संख्या में सेना दिख रही है। भारत का रुख भी बदला हुआ है।
लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रिंचन नामग्याल कहते हैं कि लद्दाख की सरहद देश की आजादी से पूर्व जहां तक थीं, वर्तमान में चीन उससे कहीं भीतर आकर काबिज है। सात दशक से चीन ने कभी सेना तो कभी चरवाहों को भेजकर जमीन कब्जाने की कोशिशें जारी रखी हैं। गलवां घाटी में इस बार जिस तरह का सैन्य जमावड़ा हो गया है, वह चीन की बड़ी तैयारी की ओर इशारा करता है। भारत को ड्रैगन की हरकतों पर हर हाल में लगाम लगानी होगी।
लेह की अंजुमन इमामिया के अध्यक्ष अशरफ अली बारचा कहते हैं कि चीन के साथ भारत की नीति रक्षात्मक रही है। चीन इसी का फायदा उठाने की कोशिश करता है। उसके चरवाहे इस तरफ आते हैं। चीन की पीएलए इन चरवाहों की आड़ में पहले टेंट लगाती है और फिर हमारे क्षेत्र पर दावा ठोकती है। इस बार गलवां घाटी में चीन के सैनिकों का जमावड़ा है, जिसके जवाब में भारतीया सेना ने भी तैनाती बढ़ा दी है। बारचा के अनुसार सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग भी डरे हुए हैं। चीन को हर हाल में रोकना होगा।
चीन जानता है कि भारत अब 1962 वाला देश नहीं है : बाना सिंह
जम्मू-कश्मीर के इकलौते परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह कहते हैं कि चीन जानता है कि भारत अब 1962 वाला देश नहीं है। गलवां घाटी के तनाव को युद्ध जैसे हालात की संज्ञा देना सही नहीं होगा। फौज को पता है किस हरकत का कैसे जवाब देना है। सियाचिन में वर्ष 1987 के ऑपरेशन राजीव में अदम्य साहस दिखाकर परमवीर चक्र पदक हासिल करने वाले कैप्टन बाना सिंह ने कहा, ‘मैं व्यक्गित रूप से मानता हूं कि चीन की इस हिमाकत का रणनीतिक रूप से जवाब देना चाहिए। मुझे विश्वास भी है कि भारतीय फौज इसे लेकर पूरी तैयारी कर चुकी है।’
लद्दाखी के नाम पर है गलवां घाटी
भारत और चीन के बीच जिस नदी पर तनाव बना हुआ है, उसका नाम एक लद्दाखी के नाम पर है। गुलाम रसूल गलवां ने वर्ष 1899 में ब्रिटेन के संयुक्त आयुक्त के साथ लेह से ट्रैकिंग कर दुरूह भौगोलिक क्षेत्र में नए रूट तलाशे। इसी दौरान गुलाम रसूल गलवां ने एक नदी की भी खोज की। गुलाम रसूल गलवां को इससे जबरदस्त ख्याति मिली। इसके बाद से नदी का नाम गलवां और क्षेत्र का नाम गलवां घाटी पड़ गया। इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ है, जब किसी नदी का नाम किसी व्यक्ति के नाम से प्रचलित हो।