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जम्मू-कश्मीर: बारामुला में कबाइलियों के आतंक को खत्म करने के लिए पैदल ही टूट पड़े थे सैनिक, शहीदों को श्रद्धांजलि दी

Thu, 28 Oct 2021 12:13 AM IST
Trainee Trainee न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: Trainee Trainee Updated Thu, 28 Oct 2021 12:13 AM IST
सार

कबाइलियों के भेष में घुसी पाकिस्तानी फौज ने वर्ष 1947 में 14000 की आबादी वाले बारामुला कस्बे में तबाही मचा दी थी। सेना की त्वरित कार्रवाई करते हुए श्रीनगर को पाकिस्तानी आदिवासियों के हाथों में पड़ने से बचा लिया था।
 

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Army Day celebrated to commemorate the victory over the tribals in Baramulla, remember the martyrs
बारामुला में शहीदों को श्रद्धांजलि देते सैन्य कर्मी। - फोटो : सेना

विस्तार

बारामुला में सेना ने 1947 में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी हमलावरों का मुकाबला करने में पैदल सेना के सर्वोच्च बलिदान की स्मृति में 75वां इन्फैंट्री दिवस मनाया। बुधवार को आयोजित समारोह में सेना के साथ-साथ नागरिकों ने सिख युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ कश्मीर को पाकिस्तानी कबाइली आक्रमणकारियों से बचाने के लिए सेना और बारामुला के स्थानीय लोगों की वीरतापूर्ण कार्रवाइयों को याद किया गया।

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इस अवसर पर जम्मू-कश्मीर राज्य बलों के प्रमुख ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह और स्थानीय हीरो मकबूल शेरवानी को भी श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जिन्होंने सबसे खूनी लड़ाई में से एक को लड़ा, जहां उन्होंने हजारों आदिवासियों के खिलाफ 200 जवानों के साथ संघर्ष किया और आखिरी सांस तक लड़ते रहे। मालूम हो कि कबाइलियों के भेष में घुसी पाकिस्तानी फौज ने वर्ष 1947 में 14000 की आबादी वाले बारामुला कस्बे में तबाही मचा दी थी।
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उसी दिन महाराजा हरी सिंह के आग्रह पर लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत की कमान वाली सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन डकोटा विमान से श्रीनगर पहुंची। भारतीय सेना के आगमन से पहले, जम्मू और कश्मीर राज्य बलों के चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को पहले ही सर्वोच्च बलिदान दिया था और श्रीनगर से 110 किलोमीटर दूर उड़ी में वह शहीद हो गए थे।
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परंतु भारतीय सेना की त्वरित कार्रवाई ने श्रीनगर को पाकिस्तानी आदिवासियों के हाथों में पड़ने से बचा लिया था। श्रीनगर में पहले सिख की लैंडिंग को गर्व से पैदल सेना दिवस के रूप में उत्सव मनाया जाता है ।161 इन्फैंट्री ब्रिगेड के तहत 1 सिख, 1 कुमाऊं और 7 कैवेलरी के सैनिकों ने शेलतेंग और बारामुला में 634 दुश्मनों को मार गिराया। इसके साथ ही बारामुला को 9 नवंबर और उड़ी को 11 नवंबर 1947 को हमलावरों के कब्ज से मुक्त करा लिया गया।

 
बोनियार के बुजुर्ग नहीं भूले अत्याचार
सात दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन बोनियार तहसील के निवासियों पर कबाइलियों द्वारा किए गए अत्याचार अभी भी स्थानीय बुजुर्ग भूल नहीं पाए हैं। बोनियार को बचाने और कबाइलियों से संघर्ष में प्राणों की आहुति देने वाले भारतीय सेना के वीरों के प्रति सम्मान के रूप में क्षेत्र के बुजुर्गों ने ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह मेमोरियल, बोनियार में कार्यक्रम आयोजित किया। बोनियार की प्रख्यात हस्तियों ने अपने अनुभव भी साझा किए। नज़र बोनियारी ने 22 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक की घटना का वर्णन किया। 

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