ईद पर अल कायदा ने सुरक्षा बलों के लिए खड़ी की चुनौती, डीएसपी की हत्या नए खतरे के संकेत
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कश्मीर में अब अलगाववादियों, हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए तैयबा से अधिक कश्मीर तालिबान का खतरा पैदा हो गया है। अल कायदा के बदले चेहरे कश्मीर तालिबान को इस्लाम के लिए जेहाद में मिल रही सफलता नए खतरे का संकेत है। घाटी में आईएस ने पैर पसारना शुरू कर दिया है।
कश्मीरियत के दम तोड़ने का खतरा पैदा हुआ है। सूफी धर्मस्थलों की जगह वहाबी मस्जिदों से जंग का एलान हो रहा है। रमजान के अंतिम सप्ताह में शब-ए कदर पर रात्रि नमाज से अल्लाह से सारे पाप माफ करने की दुआ मांगी जाती रही है, लेकिन उसी दिन हिंसक भीड़ ने डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की बेरहमी से हत्या कर दी। उन्नीस साल पहले 1998 में वनधामा में 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या के लिए इसी रात को गवाह बनाया गया था।
इस बार कश्मीर में खूनी रमजान के बाद ईद पर नए आतंकी संगठनों की चुनौती है। ऐसा माहौल बन रहा है, जिसमें पुलिस वालों में खौफ की स्थिति है। कश्मीर के पुलिस वाले अब गांवों में जाने से कतराने लगे हैं। पुलिस मुख्यालय ने इस बाबत पहले ही एडवाइजरी जारी कर दी थी।
आतंकी जाकिर मूसा अब बना बड़ी चुनौती
शब-ए-कदर के दिन हुर्रियत के उदार समझे जाने वाले गुट के मीरवाइज उमर फारूक की इस्लामी तकरीर के दौरान मस्जिद के बाहर हुई डीएसपी की हत्या के बाद एक नए कश्मीर का चेहरा सामने आया है जो कश्मीरियत के दम तोड़ते वजूद की ओर इशारा करता है। मीरवाइज के खिलाफ जांच शुरू हुई है, लेकिन सुरक्षा बलों के लिए ईद के दिन अमन की चुनौती खड़ी है।
सुरक्षा बलों से जुड़ी एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि हिजबुल से अलग हुआ आतंकी जाकिर मूसा अब सबसे बड़ी चुनौती है। डीएसपी की हत्या के दौरान भी मूसा के समर्थन में नारे लगाए जा रहे थे। डीएसपी की हत्या से पहले एक एसएचओ की बेरहमी से हत्या और उससे पहले लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की हत्या ने कश्मीर में आतंक के नए चेहरे को बेनकाब किया है।
पुलिस और सुरक्षा बलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। इन घटनाओं के बाद कभी जैश-ए मोहम्मद, कभी लश्कर-ए तैयबा और कभी हिजबुल के नाम लिए जाते हैं, लेकिन अब कश्मीर तालिबान का नाम उभरने लगा है। वहाबी मस्जिदों की संख्या दोगुनी हुई
आतंक और उपद्रव को मस्जिद कमेटियों से मदद मिलने की बात सुरक्षा एजेंसियां भी स्वीकारती हैं। इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाली वहाबी मस्जिदों की संख्या एक हजार से बढ़कर दो हजार से अधिक हो गईं हैं। कश्मीरी युवाओं की संख्या अब सूफी धर्मस्थलों के बजाय इन मस्जिदों में अधिक रहती है। यह नया खतरा है।