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दादा ने चार आतंकियों को अकेले ही किया ढेर, खुद हुए शहीद
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
Updated Fri, 27 May 2016 11:14 PM IST
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आतंकियों के समूह पर भारी पड़ी दादा की दिलेरी
- फोटो : PTI
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उत्तरी कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों पर दादा की दिलेरी भारी साबित हुई।
13 हजार फीट की ऊंचाई वाली शमसाबाड़ी रेंज में आतंकियों की मूवमेंट देखने के बाद से मोर्चा संभाले हवलदार हंगपान दादा ने मुठभेड़ शुरू होने से लेकर आखिर तक हिम्मत नहीं हारी। पहले दो आतंकी ढेर किए। फिर एक और को मार गिराया।
बाद में चौथे आतंकी को शुक्रवार खत्म कर दिया गया। इस पूरे अभियान में साहस की नजीर बनने के बाद दादा खुद भी शहीद हो गए। सैन्य अधिकारी के अनुसार 36 वर्षीय हंगपान दादा ने पाक अधिकृत कश्मीर से घुसपैठ कर सरहद के इस पार आए चारों आतंकियों को सबसे पहले देखा था। वीरवार को आतंकियों के समूह को देखते ही दादा आतंकियों पर टूट पड़े।
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13 हजार फीट की ऊंचाई वाली शमसाबाड़ी रेंज में आतंकियों की मूवमेंट देखने के बाद से मोर्चा संभाले हवलदार हंगपान दादा ने मुठभेड़ शुरू होने से लेकर आखिर तक हिम्मत नहीं हारी। पहले दो आतंकी ढेर किए। फिर एक और को मार गिराया।
बाद में चौथे आतंकी को शुक्रवार खत्म कर दिया गया। इस पूरे अभियान में साहस की नजीर बनने के बाद दादा खुद भी शहीद हो गए। सैन्य अधिकारी के अनुसार 36 वर्षीय हंगपान दादा ने पाक अधिकृत कश्मीर से घुसपैठ कर सरहद के इस पार आए चारों आतंकियों को सबसे पहले देखा था। वीरवार को आतंकियों के समूह को देखते ही दादा आतंकियों पर टूट पड़े।
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दो दिनों तक चली मुठभेड़ में मारे गए चार आतंकी
मुठभेड़ के दौरान मोर्चा संभाले सेना के जवान
- फोटो : PTI
खुद की सुरक्षा को नजरअंदाज कर दादा ने पहले आतंकियों को मुठभेड़ में उलझाए रखा और बाद में खुद घायल होने के बावजूद बेहद कारगर योजना पर काम करते हुए एक एक कर आतंकियों का सफाया कर दिया। आतंकी ऊंचाई पर थे लिहाजा दादा के सामने चुनौती और भी बड़ी हो गई थी।
घायल होने की वजह से उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था, इसके बावजूद दादा ने दो दिन चली मुठभेड़ में चारों को चित करने में कामयाबी हासिल की। वर्ष 1997 में असम रेजीमेंट का हिस्सा बने दादा को 35 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनाती दी गई।
अरूणाचल प्रदेश के दूरदराज गांव बोदूरिया के रहने वाले दादा के शव को सैन्य सम्मान के साथ पैतृक गांव में अंतिम विदाई दी जाएगी। दादा अपने पीछे पत्नी चासेन लोवांग, बेटी रौखिन (10) और बेटा सेनवांग (6) छोड़ गए हैं।
घायल होने की वजह से उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था, इसके बावजूद दादा ने दो दिन चली मुठभेड़ में चारों को चित करने में कामयाबी हासिल की। वर्ष 1997 में असम रेजीमेंट का हिस्सा बने दादा को 35 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनाती दी गई।
अरूणाचल प्रदेश के दूरदराज गांव बोदूरिया के रहने वाले दादा के शव को सैन्य सम्मान के साथ पैतृक गांव में अंतिम विदाई दी जाएगी। दादा अपने पीछे पत्नी चासेन लोवांग, बेटी रौखिन (10) और बेटा सेनवांग (6) छोड़ गए हैं।