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इंजीनियरों के बंकर के डिजाइन पर उठे सवाल
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कठुआ। ग्रामीणों ने बताया कि व्यक्तिगत बंकरों में न तो शौचालय का प्रबंध है और न ही किचन का। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गोलाबारी जारी रहती है, तो ऐसे में लोगों को मजबूरन शौच के लिए बाहर निकलना पड़ेगा। भोजन का प्रबंध करने के लिए भी बंकरों को छोड़कर घर में जाना पड़ेगा। इसलिए ग्रामीण निजी बंकरों के डिजाइन पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जा रही है।
सीमावर्ती ग्रामीणों के अनुसार जमीन से पांच फुट गहराई में बंकर बनाए जा रहे हैं, जिनके लिए ग्राउंड वॉटर का कोई ट्रीटमेंट भी नहीं किया गया है। ऐसे में बरसात के मौसम में इन बंकरों का बावलियां बनना तय है। बरसात तो दूर सर्दियों की बारिश ने ही बंकर निर्माण की पोल खोलकर रख दी है।
आईबी पर बनाए जा रहे बंकरों के दरवाजे, पांच फुट नीचे बनाए गए हैं। इन बंकरों में घुसने के लिए बनाई गई सीढ़ियों को खाली छोड़ा गया है। ऐसे में पाकिस्तान की गोलाबारी के समय कब गोला आकर सीढ़ियों की ओर गिरे, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसे भी ग्रामीण बंकर के डिजाइन में भारी चूक मान रहे हैं।
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लोगों ने सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट मांगे थे, लेकिन सीमावर्ती लोगों की इस मांग को भी नजरअंदाज किया गया। वर्ष 2015 के जनवरी माह में हीरानगर बार्डर गोलाबारी के बीच घर बार छोड़ आए लोगों से पीएमओ मंत्री ने तीन माह के भीतर सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट उपलब्ध करवाने का वायदा किया। हालात ऐसे हो गए कि अब पांच-पांच मरले के प्लाट की बात तो कोई नहीं करता, अलबत्ता एक वर्ष पूर्व बंकरों की योजना के कसीदे पढ़ दिए गए। जुलाई माह से शुरू हुए काम के पूरा होने को लेकर कोई समय सीमा भी नजर नहीं आ रही है।
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सीमावर्ती ग्रामीणों के अनुसार जमीन से पांच फुट गहराई में बंकर बनाए जा रहे हैं, जिनके लिए ग्राउंड वॉटर का कोई ट्रीटमेंट भी नहीं किया गया है। ऐसे में बरसात के मौसम में इन बंकरों का बावलियां बनना तय है। बरसात तो दूर सर्दियों की बारिश ने ही बंकर निर्माण की पोल खोलकर रख दी है।
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आईबी पर बनाए जा रहे बंकरों के दरवाजे, पांच फुट नीचे बनाए गए हैं। इन बंकरों में घुसने के लिए बनाई गई सीढ़ियों को खाली छोड़ा गया है। ऐसे में पाकिस्तान की गोलाबारी के समय कब गोला आकर सीढ़ियों की ओर गिरे, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसे भी ग्रामीण बंकर के डिजाइन में भारी चूक मान रहे हैं।
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लोगों ने सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट मांगे थे, लेकिन सीमावर्ती लोगों की इस मांग को भी नजरअंदाज किया गया। वर्ष 2015 के जनवरी माह में हीरानगर बार्डर गोलाबारी के बीच घर बार छोड़ आए लोगों से पीएमओ मंत्री ने तीन माह के भीतर सुरक्षित स्थानों पर पांच-पांच मरले के प्लाट उपलब्ध करवाने का वायदा किया। हालात ऐसे हो गए कि अब पांच-पांच मरले के प्लाट की बात तो कोई नहीं करता, अलबत्ता एक वर्ष पूर्व बंकरों की योजना के कसीदे पढ़ दिए गए। जुलाई माह से शुरू हुए काम के पूरा होने को लेकर कोई समय सीमा भी नजर नहीं आ रही है।