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सात दशक पुरानी नहर बन गई कूड़ादान
Updated Tue, 27 Mar 2018 10:27 AM IST
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कठुआ। वर्ष 1956 से 1961 के बीच 76 लाख 56 हजार की भारी भरकम राशि से तैयार हुई कठुआ नहर सात दशक बाद अब बदहाली का शिकार हो चुकी है। हैरानी की बात है कि शहर के बीचों बीच से गुजरने वाली इस नहर की अपग्रेडेशन के लिए नाबार्ड के तहत एक दशक पूर्व भेजी गई योजना को भी सरकार ने अब तक गंभीरता से नहीं लिया है। इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। उनके खेतों में अब पानी भी नहीं पहुंच पाता है।
मग्गर खड्ड से शुरू होकर उज्ज दरिया के नजदीक तक 14 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करने वाली इस नहर की क्षमता जहां 400 क्यूसेक थी। अब यह घटकर 300 क्यूसेक से भी कम रह गई है। नाबार्ड के तहत मंजूरी के लिए भेजी गई परियोजना में इस नहर के ऊंचाई बढ़ाने और कमियों को सही करने से 400 क्यूसेक पानी पूरा खेतों तक पहुंचाया जा सकता है, जिसके लिए लगभग 25 करोड़ के खर्चे का अनुमान है। कठुआ नहर की 9 डिस्ट्रिब्यूट्री भी हैं जो विभिन्न इलाकों तक कठुआ नहर का पानी पहुंचाने में मदद करती हैं। कम डिस्चार्ज के बावजूद हर साल नहर पर लाखों रुपये की मोटी रकम का खर्चा डिसिल्टिंग यानी बालू आदि निकालने के लिए किया जाता है।
विभाग थोड़ी बहुत मरम्मत भी करवाता है, लेकिन शहर के बीच से होकर गुजरने का खामियाजा भी इस नहर को भुगतना पड़ता है। आम लोगों के घरों से निकलने वाले कचरे को भले ही सरकार एक जगह एकत्रित करने की योजनाएं बनाती रहे, लेकिन नहर के किनारे और बीच के हालात असली कहानी साफ बयां करते हैं। हर ओर कूड़े के ढेर सिर्फ नहर बंद होने पर ही नहीं पानी के बहाव में भी देखे जा सकते हैं। आस्था की बात हो या फिर घरों से निकलने वाले कूडे़ की, सब नहर में ही जाता है। ऐसे में नहर का पानी भी अब खेतों को जहरीला लगने लगा है। दुकानों से निकलने वाला रोजाना कचरा भी आमतौर पर नहर में ही फेंका जा रहा है। पिछले लगभग डेढ़ महीने से बंद पड़ी नहर में पनप रहे मच्छर, दुर्गंध और कूड़े के ढेर इस बात की साफ तसदीक कर रहे हैं।
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अभी तक काम शुरू नहीं हुआ डिसिल्टिंग का
जलस्त्रोतों को स्वच्छ रखने के लिए मंत्रालय चाहे करोड़ों खर्च कर लें लेकिन संवेदनहीनता सिर्फ आम लेागों में ही नहीं संबंधित विभाग में भी देखने को मिलती है। बैसाखी पर अमूमन किसानों को खेतों के लिए कठुआ कनाल से पानी मुहैया करवाया जाता है। इस बार भी एक महीने से अधिक का समय हो चुका है नहर में पानी बंद हुए लेकिन अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। नहर के किसी भी कौने में सफाई होती नजर नहीं आ रही। हर साल विभाग लेट लतीफी में इस काम को पूरा करवाता है जिसके बाद पानी छोड़ने के दबाव में सफाई में आई लागत से सही काम हुआ भी है या नहीं यह देख पाना भी मुनासिब नहीं हो पाता । सरकारी काम में समय तो लगता है लेकिन इस बीच गर्मियों की शुरूआत होने से गंदगी और मच्छर के पनपने की सबसे उपयुक्त और बड़ी जगह कठुआ कनाल बन चुकी है।
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मग्गर खड्ड से शुरू होकर उज्ज दरिया के नजदीक तक 14 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करने वाली इस नहर की क्षमता जहां 400 क्यूसेक थी। अब यह घटकर 300 क्यूसेक से भी कम रह गई है। नाबार्ड के तहत मंजूरी के लिए भेजी गई परियोजना में इस नहर के ऊंचाई बढ़ाने और कमियों को सही करने से 400 क्यूसेक पानी पूरा खेतों तक पहुंचाया जा सकता है, जिसके लिए लगभग 25 करोड़ के खर्चे का अनुमान है। कठुआ नहर की 9 डिस्ट्रिब्यूट्री भी हैं जो विभिन्न इलाकों तक कठुआ नहर का पानी पहुंचाने में मदद करती हैं। कम डिस्चार्ज के बावजूद हर साल नहर पर लाखों रुपये की मोटी रकम का खर्चा डिसिल्टिंग यानी बालू आदि निकालने के लिए किया जाता है।
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विभाग थोड़ी बहुत मरम्मत भी करवाता है, लेकिन शहर के बीच से होकर गुजरने का खामियाजा भी इस नहर को भुगतना पड़ता है। आम लोगों के घरों से निकलने वाले कचरे को भले ही सरकार एक जगह एकत्रित करने की योजनाएं बनाती रहे, लेकिन नहर के किनारे और बीच के हालात असली कहानी साफ बयां करते हैं। हर ओर कूड़े के ढेर सिर्फ नहर बंद होने पर ही नहीं पानी के बहाव में भी देखे जा सकते हैं। आस्था की बात हो या फिर घरों से निकलने वाले कूडे़ की, सब नहर में ही जाता है। ऐसे में नहर का पानी भी अब खेतों को जहरीला लगने लगा है। दुकानों से निकलने वाला रोजाना कचरा भी आमतौर पर नहर में ही फेंका जा रहा है। पिछले लगभग डेढ़ महीने से बंद पड़ी नहर में पनप रहे मच्छर, दुर्गंध और कूड़े के ढेर इस बात की साफ तसदीक कर रहे हैं।
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जलस्त्रोतों को स्वच्छ रखने के लिए मंत्रालय चाहे करोड़ों खर्च कर लें लेकिन संवेदनहीनता सिर्फ आम लेागों में ही नहीं संबंधित विभाग में भी देखने को मिलती है। बैसाखी पर अमूमन किसानों को खेतों के लिए कठुआ कनाल से पानी मुहैया करवाया जाता है। इस बार भी एक महीने से अधिक का समय हो चुका है नहर में पानी बंद हुए लेकिन अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। नहर के किसी भी कौने में सफाई होती नजर नहीं आ रही। हर साल विभाग लेट लतीफी में इस काम को पूरा करवाता है जिसके बाद पानी छोड़ने के दबाव में सफाई में आई लागत से सही काम हुआ भी है या नहीं यह देख पाना भी मुनासिब नहीं हो पाता । सरकारी काम में समय तो लगता है लेकिन इस बीच गर्मियों की शुरूआत होने से गंदगी और मच्छर के पनपने की सबसे उपयुक्त और बड़ी जगह कठुआ कनाल बन चुकी है।