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भगवत प्रेम वास्तविक शांति का एकमात्र उपाय
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उधमपुर: सुभाष शास्त्री जी प्रवचन करते हुए तथा बैठी संगत.
- फोटो : UDHAMPUR
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भगवत प्रेम वास्तविक शांति का एकमात्र उपाय
रक्ख बडाली ओमाडा मोड़ क्षेत्र में हुआ सत्संग का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। आत्मिक शांति की अभिलाषा सभी को होती है। उसे पाने के लिए मनुष्य जीवन भर सांसारिक वस्तु, व्यक्ति व पदार्थों को प्राप्त करने में लगा रहता है। यह सब शायद प्राप्त हो भी जाएं, लेकिन शांति नहीं मिल पाती। जो मिलेगा, वह छिनेगा भी अवश्य। और जब छिनेगा तो शांति और सुख के स्थान पर दुख प्राप्त होगा। वास्तविक शांति केवल भगवत प्रेम से मिलती है। यह संदेश कथावाचक सुभाष शास्त्री ने नगर के रक्ख बडाली ओमाडा मोड़ क्षेत्र में आयोजित सत्संग में दिया।
उन्होंने कहा कि मन से संसार के मिथ्या मोह, ममत्व को त्यागने से और प्रभु को अपना बना लेने से भगवान से प्रेम होता है। वास्तविकता यह है कि जितने भी इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले भोग हैं, सब के सब दुख की उत्पत्ति करने वाले और अनित्य है। बुद्धिमान साधक उनमें कभी प्रीति नहीं करता। संसार की कोई भी वस्तु सदा सहारा नहीं दे सकती। आप स्वयं अनुभव करते ही हैं कि माता-पिता का सहारा सदा नहीं रहता। ठीक इसी प्रकार धन, दौलत, मकान, जमीन भी नहीं रहते। शरीर नहीं रहता, स्वास्थ्य नहीं रहता, पद प्रतिष्ठा नहीं रहता। सुख चाहते है तो भगवान से प्रेम करो।
अंत में उन्होंने कहा कि जो मनुष्य भगवान से प्रेम करता है, उससे कभी कोई दुष्कर्म हो ही नहीं सकता। आप देख रहे हैं कि आज देश में कितने भयानक दुष्कर्म हो रहे हैं। क्या प्रभु ने मानव जाति ऐसे अपराध करने के लिए उत्पन्न की है? नहीं, यह तो कुछ पापी आत्माएं हैं जो ऐसे दुष्कर्म कर मानव जाति पर कलंक लगाने का प्रयास कर रही हैं। आपको अपने सत्कर्मों के द्वारा इन्हें धोना है।
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रक्ख बडाली ओमाडा मोड़ क्षेत्र में हुआ सत्संग का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। आत्मिक शांति की अभिलाषा सभी को होती है। उसे पाने के लिए मनुष्य जीवन भर सांसारिक वस्तु, व्यक्ति व पदार्थों को प्राप्त करने में लगा रहता है। यह सब शायद प्राप्त हो भी जाएं, लेकिन शांति नहीं मिल पाती। जो मिलेगा, वह छिनेगा भी अवश्य। और जब छिनेगा तो शांति और सुख के स्थान पर दुख प्राप्त होगा। वास्तविक शांति केवल भगवत प्रेम से मिलती है। यह संदेश कथावाचक सुभाष शास्त्री ने नगर के रक्ख बडाली ओमाडा मोड़ क्षेत्र में आयोजित सत्संग में दिया।
उन्होंने कहा कि मन से संसार के मिथ्या मोह, ममत्व को त्यागने से और प्रभु को अपना बना लेने से भगवान से प्रेम होता है। वास्तविकता यह है कि जितने भी इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले भोग हैं, सब के सब दुख की उत्पत्ति करने वाले और अनित्य है। बुद्धिमान साधक उनमें कभी प्रीति नहीं करता। संसार की कोई भी वस्तु सदा सहारा नहीं दे सकती। आप स्वयं अनुभव करते ही हैं कि माता-पिता का सहारा सदा नहीं रहता। ठीक इसी प्रकार धन, दौलत, मकान, जमीन भी नहीं रहते। शरीर नहीं रहता, स्वास्थ्य नहीं रहता, पद प्रतिष्ठा नहीं रहता। सुख चाहते है तो भगवान से प्रेम करो।
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अंत में उन्होंने कहा कि जो मनुष्य भगवान से प्रेम करता है, उससे कभी कोई दुष्कर्म हो ही नहीं सकता। आप देख रहे हैं कि आज देश में कितने भयानक दुष्कर्म हो रहे हैं। क्या प्रभु ने मानव जाति ऐसे अपराध करने के लिए उत्पन्न की है? नहीं, यह तो कुछ पापी आत्माएं हैं जो ऐसे दुष्कर्म कर मानव जाति पर कलंक लगाने का प्रयास कर रही हैं। आपको अपने सत्कर्मों के द्वारा इन्हें धोना है।

उधमपुर: सुभाष शास्त्री जी प्रवचन करते हुए तथा बैठी संगत.- फोटो : UDHAMPUR
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