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जैसा गुरु वैसा चेला, जैसा विचार वैसा संसार : सुभाष शास्त्री
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संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। शहर के नजदीक परम धाम आश्रम उमाला में रविवार को संत सुभाष शास्त्री ने सत्संग किया। प्रवचनों में उन्होंने कहा कि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, जैसा संग वैसा रंग, जैसा पानी वैसी वाणी, जैसा कर्म वैसा फल, जैसा गुरु वैसा चेला, जैसा विचार वैसा संसार।
उन्होंने कहा कि नजर बदली तो नजारे बदल गए। किश्ती का रुख बदला तो किनारे बदल गए। उन्होंने एक कथा के माध्यम से इसका अर्थ समझाया। बताया कि एक बार एक नगर में एक शीश महल था। महल की हर दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल के भीतर घुस गया। उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो उससे नाराज थे। उन्हें देख कर वह कुत्ता उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डर कर वहां से भाग गया।
कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीश महल पहुंचा। वह खुश मिजाज और जिंदादिल था। शीश महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते हुए दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सब से बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।
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कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्यों से कहा कि संसार भी ऐसा ही शीश महल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं, उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता। अंत में शास्त्री महाराज ने विश्व कल्याण की भगवान से प्रार्थना की।
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उधमपुर। शहर के नजदीक परम धाम आश्रम उमाला में रविवार को संत सुभाष शास्त्री ने सत्संग किया। प्रवचनों में उन्होंने कहा कि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, जैसा संग वैसा रंग, जैसा पानी वैसी वाणी, जैसा कर्म वैसा फल, जैसा गुरु वैसा चेला, जैसा विचार वैसा संसार।
उन्होंने कहा कि नजर बदली तो नजारे बदल गए। किश्ती का रुख बदला तो किनारे बदल गए। उन्होंने एक कथा के माध्यम से इसका अर्थ समझाया। बताया कि एक बार एक नगर में एक शीश महल था। महल की हर दीवार पर सैकड़ों शीशे जड़े थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल के भीतर घुस गया। उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो उससे नाराज थे। उन्हें देख कर वह कुत्ता उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डर कर वहां से भाग गया।
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कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीश महल पहुंचा। वह खुश मिजाज और जिंदादिल था। शीश महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते हुए दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सब से बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।
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कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्यों से कहा कि संसार भी ऐसा ही शीश महल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं, उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता। अंत में शास्त्री महाराज ने विश्व कल्याण की भगवान से प्रार्थना की।