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जरूरतमंद तड़पते हैं खून फेंका जाता है
ब्यूरो/अमर उजाला, उधमपुर
Updated Wed, 11 May 2016 12:51 AM IST
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जिला अस्पताल के ब्लड बैंक से हर साल औसतन 48 बोतल खून को यूं ही फेंक दिया जाता है। वह या तो एक्सपायर हो चुका होता है या फिर हिमोलाइज्ड होता है। बर्बाद होने वाले खून में पाजिटिव ग्रुप के भी शामिल होते हैं। इससे साफ होता है कि खून लेने वालों की सही तरीके से पहले जांच नहीं की जाती है।
दरअसल, सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट संजीत कुमार बवोरिया ने एडीसी से जानकारी मांगी थी कि 01 जनवरी 1997 से 31 मार्च 2016 तक जिला अस्पताल में कितने बोलत नेगेटिव ग्रुप या एक्सपायरी खून को नष्ट किया गया है।
इस पर प्रशासन की ओर से जानकारी दी गई कि 4 अप्रैल 2001 से लेकर 31 मार्च 2016 तक जिला अस्पताल में कुुल 22781 बोतल खून प्राप्त हुआ। इसमें से 721 बोतल खून को नष्ट किया गया। इनमें पाजिटिव ग्रुप के 92 बोतल, एक्सपायरी डेट की 302 और हिमोलाइज्ड 210 बोतल खून के अलावा नेगेटिव ग्रुप के 117 बोतल खून शामिल थे।
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इन आंकड़ों पर बवोरिया ने जिला अस्पताल प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाया और कहा कि जिला अस्पताल में मरीज खून लेने के लिए तड़पते रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ खून को पानी की तरह बहाया जा रहा है।
इससे साफ जाहिर हो रहा कि जिला अस्पताल न केवल उन लोगों के साथ धोखा करता है जो खून के लिए तड़पते रहते हैं, बल्कि खून दान देने वालों के साथ भी धोखा किया जाता है। यह भी सवाल उठाया कि बिना जांच किए ऐसा खून क्यों लिया जाता है जो किसी के काम नहीं आ सकता है। खून लेने से पहले उसकी सही तरीके से जांच करनी चाहिए।
कई बार नेगेटिव खून और एचआईवी संक्रमित खून मिल जाने का कारण उसे नष्ट करना पड़ता है। खून एक्सपायर होने से पहले ही जरूरतमंद लोगों को दे दिया जाता है। कोशिश रहता है कि खून नाड़ियों में बहाया जाए न कि नालियों में।
नरेंद्र सिंह भत्याल, सुपरिंटेंडेंट, जिला अस्पताल
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दरअसल, सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट संजीत कुमार बवोरिया ने एडीसी से जानकारी मांगी थी कि 01 जनवरी 1997 से 31 मार्च 2016 तक जिला अस्पताल में कितने बोलत नेगेटिव ग्रुप या एक्सपायरी खून को नष्ट किया गया है।
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इस पर प्रशासन की ओर से जानकारी दी गई कि 4 अप्रैल 2001 से लेकर 31 मार्च 2016 तक जिला अस्पताल में कुुल 22781 बोतल खून प्राप्त हुआ। इसमें से 721 बोतल खून को नष्ट किया गया। इनमें पाजिटिव ग्रुप के 92 बोतल, एक्सपायरी डेट की 302 और हिमोलाइज्ड 210 बोतल खून के अलावा नेगेटिव ग्रुप के 117 बोतल खून शामिल थे।
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इन आंकड़ों पर बवोरिया ने जिला अस्पताल प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाया और कहा कि जिला अस्पताल में मरीज खून लेने के लिए तड़पते रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ खून को पानी की तरह बहाया जा रहा है।
इससे साफ जाहिर हो रहा कि जिला अस्पताल न केवल उन लोगों के साथ धोखा करता है जो खून के लिए तड़पते रहते हैं, बल्कि खून दान देने वालों के साथ भी धोखा किया जाता है। यह भी सवाल उठाया कि बिना जांच किए ऐसा खून क्यों लिया जाता है जो किसी के काम नहीं आ सकता है। खून लेने से पहले उसकी सही तरीके से जांच करनी चाहिए।
कई बार नेगेटिव खून और एचआईवी संक्रमित खून मिल जाने का कारण उसे नष्ट करना पड़ता है। खून एक्सपायर होने से पहले ही जरूरतमंद लोगों को दे दिया जाता है। कोशिश रहता है कि खून नाड़ियों में बहाया जाए न कि नालियों में।
नरेंद्र सिंह भत्याल, सुपरिंटेंडेंट, जिला अस्पताल