{"_id":"6275747cadd1225df27575e1","slug":"cultural-udhampur-news-jmu259276778","type":"story","status":"publish","title_hn":"सुख चाहिए तो मन को पवित्र रखो : सुभाष शास्त्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सुख चाहिए तो मन को पवित्र रखो : सुभाष शास्त्री
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उधमपुर। देविका तट के समीप निजी पैलेस में जारी श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन कथावाचक सुभाष शास्त्री ने भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। कथा सुनने के लिए हर रोज काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे रहें जिसमें सबसे अधिक संख्या महिला श्रद्धालुओं की देखने को मिल रही है। शुक्रवार को भी उधमपुर व इसके आसपास से आए काफी श्रद्धालुओं ने कथा का आनंद उठाया।
कथावाचक सुभाष शास्त्री ने कहा कि सुख की अभिलाषा तो सब करते हैं, लेकिन मन को अपवित्र रख कर। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य के मन को छोड़कर न कहीं पाप है और न कहीं दुख है, न कोई वैर है, न कोई झगड़ा। ऐसी दुनिया की कल्पना करें जिसमें या तो मनुष्य का नामोनिशान न हो या समस्त मनुष्य जाति मूर्छित अवस्था में हो, तो दुनिया में दुख नाम की कोई चीज न होगी।
मन की पवित्रता का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि कर्ज लेकर तीर्थ यात्राएं करने की अपेक्षा पाप कर्मों से बचना और अपने मन को पवित्र और शुद्ध रखना अधिक श्रेष्ठ है। व्यक्ति को सुख और दुख को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। समदर्शी व्यक्ति को यश-अपयश की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। सम दृष्टि के लिए मन की पवित्रता जरूरी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
कथावाचक सुभाष शास्त्री ने कहा कि सुख की अभिलाषा तो सब करते हैं, लेकिन मन को अपवित्र रख कर। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य के मन को छोड़कर न कहीं पाप है और न कहीं दुख है, न कोई वैर है, न कोई झगड़ा। ऐसी दुनिया की कल्पना करें जिसमें या तो मनुष्य का नामोनिशान न हो या समस्त मनुष्य जाति मूर्छित अवस्था में हो, तो दुनिया में दुख नाम की कोई चीज न होगी।
विज्ञापन
मन की पवित्रता का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि कर्ज लेकर तीर्थ यात्राएं करने की अपेक्षा पाप कर्मों से बचना और अपने मन को पवित्र और शुद्ध रखना अधिक श्रेष्ठ है। व्यक्ति को सुख और दुख को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। समदर्शी व्यक्ति को यश-अपयश की भी चिंता नहीं करनी चाहिए। सम दृष्टि के लिए मन की पवित्रता जरूरी है।
विज्ञापन